तो क्या होगा?
साथियों !
प्राथमिक शिक्षा की दशा और दिशा बदलने को कृतसंकल्प कुछ उत्साही शिक्षक साथियों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या कोई और नहीं बल्कि उनके इंचार्ज/प्रधानाध्यापक/कार्यवाहक प्रधानाध्यापक ही हैं जो कुछ भी नया अथवा अलग करने का प्रस्ताव समक्ष रखते ही " तो क्या होगा?" का यक्ष प्रश्न खड़े करने लगते हैं,,,,यह समस्या कुछ नवाचारी तथा अच्छे विचारों वाले इंचार्ज/प्रधानाध्यापक/कार्यवाहक शिक्षकों को छोड़कर लगभग हर विद्यालय की बनी हुई है,,,आइये देखते हैं कुछ ऐसे ही दृश्य-
प्राथमिक शिक्षा की दशा और दिशा बदलने को कृतसंकल्प कुछ उत्साही शिक्षक साथियों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या कोई और नहीं बल्कि उनके इंचार्ज/प्रधानाध्यापक/कार्यवाहक प्रधानाध्यापक ही हैं जो कुछ भी नया अथवा अलग करने का प्रस्ताव समक्ष रखते ही " तो क्या होगा?" का यक्ष प्रश्न खड़े करने लगते हैं,,,,यह समस्या कुछ नवाचारी तथा अच्छे विचारों वाले इंचार्ज/प्रधानाध्यापक/कार्यवाहक शिक्षकों को छोड़कर लगभग हर विद्यालय की बनी हुई है,,,आइये देखते हैं कुछ ऐसे ही दृश्य-
(1) आप बच्चों के लिए कभी प्रोत्साहन स्वरूप टॉफी/बिस्कुट या अन्य ऐसी ही खाद्य वस्तुएँ लेकर विद्यालय पहुँचे,,, तुरन्त कान में फटकार पड़ी की ये बाहर की चीजें बच्चों को खिलाओगे ? एक भी बच्चा खाकर बीमार पड़ा तो देख लेना नौकरी चली जायेगी,,,ज्यादा सेवाभाव जाग रहा हो तो मंदिर में भूखे को भोजन करवा आओ लेकिन यहाँ ये सब नहीं चलेगा।
(2) अक्सर MDM में कतर ब्यौत होते देख आप किसी दिन बच्चों के लिए ताज़ी साग-भाजी ले आते हैं तब तुरन्त सुनाई पड़ता है कि स्कूल का रूटीन मत बिगाड़ो,,,मैं और प्रधान जी हैं इसके लिए तुम काहे बीच में कूदते हो जी,,,अब का सरकारी रेट में इनको छप्पन भोग खिलाने की सोचे बैठे हो,,,,नए नए हो इसलिए ज्यादा उड़ने की हुड़क लग रही है,बीतने दो एकाध साल सब आटा दाल का भाव पता लग जाएगा।
(3) आपने बच्चों को कॉपी/पेन्सिल/ड्राइंग बॉक्स/पाठ्य सामग्री इत्यादि वितरित करने का मन बनाया और इधर फुँफकार गूँज उठी की ऐसे बाँटोगे तो ये बच्चे कल को घर से तिनका भी लेकर नहीं आएंगे,,सब स्कूल पर ही निर्भर हो जाएंगे, इसके अलावा गाँव वाले यही कहेंगे कि इसका पैसा सरकार की तरफ से आता है,जब से नए वाले 'मास्साब' आये हैं तब से मिलने लगा पेन्सिल-कलम नहीं तो 'पुरनका मास्टर' तो हजम कर जाता था,,इसलिए ये सब धर्म कर्म स्कूल में नहीं चलेगा,चुपचाप नौकरी करो धर्मात्मा मत बनो।
(4) आप बच्चों को कॉन्वेंट की तर्ज पर मैथ्स,साइंस और इंग्लिश में तेज तर्रार बनाने की मुहिम पर जुटते हुए सहयोग माँगते हैं और बदले में मिलता है आपको एक रटा रटाया वाक्य-"अरे मास्साब ! ये लड़के पढ़ लिखकर डीएम/कलेक्टर नहीं बनने वाले,,इनके माँ बाप को ही जब फ़िक्र नहीं इनकी तो हमने क्या इनके भविष्य का ठेका ले रखा है,आप खामखा इनके ऊपर मेहनत कर रहे हैं,ये मजदूर के बच्चे हैं और मजदूर ही बनेंगे,आप अपना समय बर्बाद ना करो"।
(5) आप विद्यालय की रंग रोगन व्यवस्था/ड्रेस/भौतिक परिवेश में सुधार के लिए प्रयासरत होने को होते हैं कि आपको बताया जाता है कि ज्यादा बढ़िया बना दिया गया तो अधिकारी लोग दौरे पर आने लगेंगे और मुसीबतें बढ़ जाएंगी,अभी जो आराम से नौकरी कट रही है ना वो सब हवा हो जायेगी ऊपर से सौ किस्म के काम मिलेंगे सो अलग,,,इसलिए ज्यादा आइंस्टीन की औलाद ना बनो चुपचाप नौकरी करो और सबको करने दो।
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ऊपर कुछ दृश्य तो नकारात्मक मानसिकता के कुछ उदाहरण मात्र हैं,स्थितियाँ इससे भी कहीं बदतर हैं और इसकी एकमात्र वजह 'निगेटिव थिंकिंग' ही है,,,दरअसल जब कोई व्यक्ति प्रोफेशनली साउंड एन्ड स्ट्रांग नहीं होता तो अपनी गलतियों को छुपाने के सौ तरीके ढूंढ़ता है,स्किल्ड टीचर हमेशा अपने फेलो टीचर्स को एनकरेज करता है और उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है,लेकिन निगेटिव अप्रोच वाले शिक्षकों से ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ है,,सबसे बड़ा आश्चर्य तो तब होता है जब स्कूल के बच्चों के लिए हमेशा निगेटिव सोच रखने वाला शिक्षक अपने खुद के बच्चे के लिए कभी निगेटिव नहीं सोचता,उसका बच्चा अगर स्कूल जाता होगा तो वह कभी नहीं सोचेगा कि उसके साथ अमुक हादसा होगा तो क्या होगा लेकिन खुद के स्कूल में कुछ नया होते देख उसकी नकारात्मक मानसिकता तुरन्त "क्या होगा ?" का अलाप सुनाने लगती है,,,सबसे बड़ा सवाल यह है कि तमाम बाहरी समस्याओं से लड़ना तो आसान है लेकिन अपने खुद के स्कूल में बैठे इन "बैरियर्स'' से लड़ना वाकई मुश्किल होता है,,इनको पता नहीं कब समझ में आएगा की स्कूल में आने वाला बच्चा भी किसी का बेटा/बेटी है और अधिकारी से इतना डरना क्यों ? अगर कुछ अच्छा करने को कदम बढ़ाएं तो अधिकारी आलोचना नहीं करता बल्कि 'समालोचना और प्रोत्साहन' देता है,,,
अंत में अपने सभी नवाचारी शिक्षक साथियों से यह निवेदन करूँगा की वे बाहरी बैरियर्स के साथ-साथ भीतरी बैरियर को भी धैर्य और प्रेम के साथ समझाइये,,,अनुभवी वे भी हैं बस दिक्कत यह है कि जोखिम लेने का साहस वे नहीं जुटा पाते,,,आप उनका हौसला बढाइये वे आपके कदम जरूर आगे बढायेंगे।
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ऊपर कुछ दृश्य तो नकारात्मक मानसिकता के कुछ उदाहरण मात्र हैं,स्थितियाँ इससे भी कहीं बदतर हैं और इसकी एकमात्र वजह 'निगेटिव थिंकिंग' ही है,,,दरअसल जब कोई व्यक्ति प्रोफेशनली साउंड एन्ड स्ट्रांग नहीं होता तो अपनी गलतियों को छुपाने के सौ तरीके ढूंढ़ता है,स्किल्ड टीचर हमेशा अपने फेलो टीचर्स को एनकरेज करता है और उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है,लेकिन निगेटिव अप्रोच वाले शिक्षकों से ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ है,,सबसे बड़ा आश्चर्य तो तब होता है जब स्कूल के बच्चों के लिए हमेशा निगेटिव सोच रखने वाला शिक्षक अपने खुद के बच्चे के लिए कभी निगेटिव नहीं सोचता,उसका बच्चा अगर स्कूल जाता होगा तो वह कभी नहीं सोचेगा कि उसके साथ अमुक हादसा होगा तो क्या होगा लेकिन खुद के स्कूल में कुछ नया होते देख उसकी नकारात्मक मानसिकता तुरन्त "क्या होगा ?" का अलाप सुनाने लगती है,,,सबसे बड़ा सवाल यह है कि तमाम बाहरी समस्याओं से लड़ना तो आसान है लेकिन अपने खुद के स्कूल में बैठे इन "बैरियर्स'' से लड़ना वाकई मुश्किल होता है,,इनको पता नहीं कब समझ में आएगा की स्कूल में आने वाला बच्चा भी किसी का बेटा/बेटी है और अधिकारी से इतना डरना क्यों ? अगर कुछ अच्छा करने को कदम बढ़ाएं तो अधिकारी आलोचना नहीं करता बल्कि 'समालोचना और प्रोत्साहन' देता है,,,
अंत में अपने सभी नवाचारी शिक्षक साथियों से यह निवेदन करूँगा की वे बाहरी बैरियर्स के साथ-साथ भीतरी बैरियर को भी धैर्य और प्रेम के साथ समझाइये,,,अनुभवी वे भी हैं बस दिक्कत यह है कि जोखिम लेने का साहस वे नहीं जुटा पाते,,,आप उनका हौसला बढाइये वे आपके कदम जरूर आगे बढायेंगे।
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