बाल मन, सरिता राय पू०मा०वि० केराकतपुर, काशी विद्यापीठ, वाराणसी

*★बाल मन की सुखद संवेदनाएं★*


दोस्तो आज मैं आप से एक मन की बात शेयर करना चाहती हूँ। इस परिपक्व उम्र  में भी मेरा मन मयूर की तरह नृत्य कर उठा। कारण यह था कि मित्रों मैनें अपने विद्यालय का सुन्दरीकरण आकर्षक रंग रोगन के जरिये यह सोच कर कराया था कि मेरा विद्यालय भौतिकता के स्तर पर समृध्दि का परिचायक होगा। अपनी कार्यशीलता दक्षता की वजह से शैक्षणिक क्रिया कलापों में मेरे विद्यालय की गरिमामय उपिस्थति का अहसास लोगों के बीच होगा।
परन्तु हमारे विद्यालय के कुछ मासूम बच्चों की बात चीत के द्वारा मुझे पता चला कि मेरे जीवन के अच्छे कार्यों मे से एक है, विद्यालय का रंग रोगन एक साधारण सी बात है पर हर साधारण चीज में एक महत्वपूर्ण विशेषता भी शायद छिपी होती है।
इस समय गुरू देव रविन्द्रनाथ टैगोर जी का कहना कि-- “ *बच्चों और प्रकृति का संसर्ग ही सबसे मुख्य शिक्षा विधि है*„
*मुझे चरितार्थ होता लगा जब कक्षा-7 के विक्रम ने आकर कहा मैम जी जिस तरह आप अपने घर का खयाल करती है, उसी तरह स्कूल का भी। फिर शिवम् का ये कहना कि आप कहती हो कि विद्यालय हमारा एक घर है तो मुझे अपने घर का ये रुप बहुत पसन्द आया। अन्जली ने कहा कि मुझे तो यही रहने का मन करता है।*
दोस्तो इन थोडे़ से पैसों ने हमारे इन बच्चों के जीवन उल्लास से भर दिया। उनकी वह खुशी मेरे लिये अमुल्य थी क्योंकि बच्चे ही हमारे असली धरोहर हैं और हमारे पास तो वह बच्चे है जो बचपन से ही जीवन की विभिषकाओं से जूझते है ऐसे में उन बच्चों से इस तरह हमेशा के लिए जुड़  जाना उन्हें एक सन्तोष उल्लास गुरू-शिष्य से माँ बेटी- बेटे के रिस्ते का अहसास अपने आप में अकथनीय है।
धन्यवाद।
सरिता राय
UPS केराकतपुर
काशी विद्यापीठ, वाराणसी
साभारः मिशन शिक्षण संवाद उ० प्र०
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