नैसर्गिक शिक्षा पद्धति : एक चिंतन

हमारी प्राचीन महान शैक्षिक प्रणाली इस हद तक श्रवण-आधारित रही है कि विश्व की प्राचीनतम ज्ञान धरोहर वेदों का नाम ही 'श्रुति' पड़ गया क्योंकि श्रुतियों का ज्ञान लिखकर नहीं वरन सुनकर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हृदयांतरित होता रहा।
आधुनिक काल में भी 'सुबोपलि' (सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना) की अवधारणा के अनुसार लिखना सबसे अंतिम क्रिया है।
किन्तु विडम्बना यह कि बच्चों को डटकर पढ़ाने के बाद भी बच्चे आकर कहते हैं, "सर जी, 'काम' दे दो।"
असल में यह मान्यता (कि काम तो लिखा हुआ ही होता है) उन मासूमों की नहीं है, बल्कि उन अभिभावकों, अध्यापकों और हमारी उस सतही शैक्षिक व्यवस्था द्वारा सुदृढ़ की गयी है जो काफी हद तक बच्चे को उसके मानसिक और चारित्रिक स्तर से नहीं, उसके लिखित कार्य से आँकने के आदी हो चुके हैं।

माना जाता है कि लिखित ज्ञान को बार-बार दोहराकर पुष्ट किया जा सकता है। किन्तु सच्चाई इसके विपरीत है।

लिखित कार्य पर निर्भर बच्चे सुनने में स्वाभाविक ही उतनी एकाग्र-चित्तता नहीं रखेंगे और ज्ञान लिखित करके उनकी स्मरण-शक्ति पर संदेह करके उसे पूर्ण संघर्ष द्वारा विकसित होने का अवसर नहीं दिया गया।

लेखन कौशल का अपना महत्त्व है किन्तु कॉपियों, पुस्तकों से लदे-दबे बच्चे की कीमत पर नहीं, स्मरण-शक्ति, एकाग्रचित्त होकर सुनने को दाँव पर लगाकर नहीं।
बच्चा अपनी एक मौलिक अल्हड़ता के साथ आगे बढ़ना चाहता है और हम उसे स्वनिर्धारित, स्वघोषित श्रेष्ठ सांचों में ढालकर बोनसाई बनाना चाहते हैं।
आज ज़रुरत है शिक्षा के अधिकाधिक सरलीकरण की, जिसमें न तो कॉपियों, किताबों से भरे बस्तों का बोझ हो, और न ही तोतारटंत और बाध्यकारी नियमों से बंधी शिक्षा पद्धतियों की ऊब।
शिक्षा पद्धति ऐसी हो
जिसमें हो सुरुचि का प्रवाह।
बचपन का उत्साह।

ज्ञान को प्रकाशित किया जाये
कहानी द्वारा
मन में बसाकर

खेल-खेल में
बात बताकर

चलते-फिरते
सुनकर सुनाकर

कुछ हँसकर
कुछ गाकर

आचरण द्वारा
चरित्र बनाकर

ज्ञान दीप को
हृदय में जलाकर

तभी हम पायेंगे भावी भारत के सच्चे कर्णधार
जिनके पास होगा मौलिकता और चरित्र का सुदृढ़ आधार।

हो सकता है कि व्यावहारिकता की दृष्टि से बातें कुछ अजीब सी प्रतीत हों किन्तु हम कर पायें या न कर पायें, सैद्धांतिक आदर्श और सोच को सामने अवश्य रखना चाहिए; क्या पता, कभी ऐसी परिस्थितियों का वातावरण बन ही जाये।

लेखक:-

प्रशांत अग्रवाल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय डहिया,
विकास क्षेत्र -फतेहगंज पश्चिमी,
जिला -बरेली

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