चुनौती स्वीकारते युवा अनमोल रत्न, संतोष प्रजापति, धर्मापुर, जौनपुर

★चुनौती स्वीकारते युवा अनमोल रत्न★

★हिम्मत से हारना मगर हिम्मत मत हारना★
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साथियों !
विगत दिवस में अभी नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा सम्पन्न हुई जिसमें परिषदीय विद्यालयों के बच्चे भी अपनी दावेदारी जताते नजर आये,,,निश्चय ही नवोदय विद्यालय ग्रामीण परिवेश में आजीविका से संघर्ष कर परिवारों के नौनिहालों के लिए एक आशा की किरण बनकर सामने आता रहा है जहाँ अभाव और आवश्यकताओं से जूझ रहे परिवारों के बच्चे अपना भविष्य सँवारते नजर आते हैं,,,कुछ उम्मीदों के साथ लगभग प्रत्येक परिषदीय विद्यालयों से कक्षा 5 में पढ़ रहे बच्चों द्वारा नवोदय विद्यालय के लिए आवेदन किये गए थे और परीक्षाओं में शामिल होने के लिए यथासम्भव तैयारी भी की होगी,,,मुझे सौभाग्य मिला इस बार अपने बच्चों को इस प्रतियोगी परीक्षा में शामिल कराने का और ससमय परीक्षा केंद्र जा पहुँचा,,,अभाव और आवश्यकता से जूझ रहे परिवारों के इन नौनिहालों ने जब वहाँ का दृश्य देखा तो बेचारे सकते में आ गए क्योंकि परीक्षा केंद्र तक अपने अभिभावकों के साथ साइकिल पर दसों किलोमीटर का सफर काटकर पहुंचने वाले इन बच्चों और फ़टे पुराने कम्बल में लिपटे ठण्ड से ठिठुरते उनके अभिभावकों का सामना हुआ मोटरसाइकिल और कार से उतरते हुए खिलखिलाते चेहरे वाले कॉन्वेंट स्कूलों के बच्चों से,जिनको ना अभाव का पता था और ना ही परीक्षा का भय,,,कोचिंग,ट्यूशन और कॉन्वेंट स्कूलिंग से लैस उन बच्चों में यह परीक्षा मात्र एक कौतूहल थी जबकि अभावग्रस्त परिवार के लिये यह एक आधार थी उज्ज्वल भविष्य का,,,बच्चों और अभिभावकों के चेहरे पर फैली निराशा देखकर ही समझ गया कि बच्चे हौसला छोड़ रहे हैं और वे अंदरूनी ज्ञान के मुकाबले बाहरी चमक दमक पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं,,,कई बार मेरे बच्चों ने जब कॉन्वेंट स्कूलों के बच्चों के हाथों में थमी नवोदय विद्यालय गाइड और तमाम सोल्व्ड पेपर्स की तरफ ध्यान आकर्षित करवाया तब मुझे लगा की इस 'महाभारत' से पूर्व इन्हें 'कर्म ज्ञान' देना अनिवार्य हो गया है,,,हालाँकि बच्चों की तैयारी काफी स्तरीय थी किन्तु उनका आत्मविश्वास अपने अभिभावकों और खुद की तुलना सक्षम परिवारों और कॉन्वेंट के बच्चों से तुलना करके खत्म सा हुआ जा रहा था जो कि परीक्षा से ठीक पहले बहुत हानिकारक बात थी,,,परिसर के एक कोने में सहमें से खड़े मैंने अपने बच्चों को ढांढस बंधाया और कहा कि चमक दमक के पीछे का सच जानना है तो किसी से अभी कॉम्पटीशन करके देख लो,,,पहले तो बच्चे सहम गए लेकिन फिर हिम्मत करके आगे आये,इधर उधर इठलाते और अपने बालक की उपलब्धियां गिनाते एक अभिभावक को मैंने पास बुलाया और कुछ प्रश्न पूछने को कहा,,,बेचारे बड़े असमंजस में पड़े लेकिन जैसे तैसे उन्होंने दस बारह ऐसे प्रश्न पूछे जो उनके सुपुत्र को भली भांति रटे हुए थे जिनका जवाब उस बच्चे ने फटाफट दिया और मेरे बच्चों ने मुश्किल से आठ-दस प्रश्नों को हल करके बताया,,,इसके बाद मैंने भी दस-बारह प्रश्नों की झड़ी लगाई जिसमें मेरे बच्चों ने सही उत्तर दिए लेकिन चिराग रौशन सुपुत्र दो जवाब से आगे नहीं बढ़ पाये,,,उक्त घटना के समय काफी लोग आस-पास इकट्ठा हो चुके थे और नाकारा कहे जाने वाले परिषदीय विद्यालय के नौनिहालों का साहस देखकर आश्चर्यचकित थे,कुछ अच्छे विचारों वाले लोग भी उसमें शामिल थे जिन्होंने पूरा नजारा देखने के बाद आगे आकर मेरे बच्चों की पीठ थपथपाकर उनका हौसला भी बढ़ाया और हिम्मत ना हारने की सलाह दी,,,हालाँकि यह एक गुरु भूमिका का छोटा सा प्रयास था लेकिन उस प्रयास से बच्चों का आत्मविश्वास वापस लौटा और चेहरा दमक उठा,परीक्षा के लिए ना केवल वे मानसिक रूप से तैयार थे बल्कि उन्हें अपने ऊपर पूरा भरोसा था कि अभिभावकों की स्थिति उनके प्रगति मार्ग को नहीं रोक पाएगी,,,कुछ ही देर पहले नन्हे मुन्ने मासूम चेहरों पर छाई उदासी जब एक मधुर मुस्कान में बदली तो एक गुरु हृदय सहसा ही आह्लादित हो उठा और एक विचार मन में आया कि आज का मुकाबला वास्तव में दरिद्रता और वैभव के बीच होने जा रहा है जिसमें प्रतिभा अभिमन्यु बनकर रह गयी है,,अब इस परीक्षा में मेरे बच्चों को सफलता मिले या पराजय किन्तु मन में एक सुकून इस बात का है कि मेरे बच्चों ने लड़ना और डटकर मुकाबला करने की पहली सीढ़ी आज तय कर ली है जो इन्हें जीवन के प्रत्येक संघर्ष में प्रेरणा देती रहेगी।
धन्यवाद,
संतोष प्रजापति
(स0अ0)
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निवेदन:-
मिशन शिक्षण संवाद उ० प्र०

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