मानवता के सहयोगी शिक्षक, संतोष प्रजापति, धर्मापुर, जौनपुर
★मावनता के सहयोगी शिक्षक★
(एक बार अवश्य पढ़ें मानवीय पहल)
राह में तिमिर है घनघोर है अंधेरा,
विकट निशा भयंकर दूर है सवेरा,
पथिक अबोध हूँ मैं मन बड़ा है व्याकुल,
निर्वाक हुई है वाणी हृदय हुआ है आकुल,
कोई किरण हृदय में आशा की तू जगा दे,
कुछ तमवेधनी के शर प्रत्यंचा चढ़ा दे,
हे ईश ! कोई ऐसा तूणीर आज थमा दे,
नियति से जूझने की संजीवनी पिला दे,
फिर कर्मलेख ऐसा जीवन में मेरे भर दे,
भाग्यकर्म को फिर अवसर में तू बदल दे,,,
विकट निशा भयंकर दूर है सवेरा,
पथिक अबोध हूँ मैं मन बड़ा है व्याकुल,
निर्वाक हुई है वाणी हृदय हुआ है आकुल,
कोई किरण हृदय में आशा की तू जगा दे,
कुछ तमवेधनी के शर प्रत्यंचा चढ़ा दे,
हे ईश ! कोई ऐसा तूणीर आज थमा दे,
नियति से जूझने की संजीवनी पिला दे,
फिर कर्मलेख ऐसा जीवन में मेरे भर दे,
भाग्यकर्म को फिर अवसर में तू बदल दे,,,
मेरे शिक्षक साथियों !
जीवन में कभी-कभी नियति ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है कि यह समझ नहीं आता कि परम पिता परमेश्वर आखिर इतनी कड़ी परीक्षाएँ क्यों लेता है,,,,मेरे विद्यालय में एक ही परिवार के तीन भाई-बहन नामांकित हैं, इस परिवार में कुल चार भाई-बहनों में सबसे बड़े भाई अभी पिछले वर्ष कक्षा पाँच इसी विद्यालय से उत्तीर्ण हुए थे जिनकी उम्र इस समय लगभग 13/14 वर्ष की होगी,,,इनकी माताजी का देहावसान दो वर्ष पहले हो चुका था और परिवार में वृद्ध हो चले दादाजी एवम पिता के अतिरिक्त कोई अन्य सदस्य संरक्षक के तौर पर नहीं था,,,पिता मजदूर वर्ग से थे जो नित्यप्रति की दैनिक मजदूरी से इस छः सदस्यीय परिवार का पेट भरते थे और बुजुर्ग दादाजी बेचारे अपने इन निरीह अबोध बच्चों के भाग्य पर आँसू बहाते किसी तरह दिन काट रहे थे,,,भाग्य की विडंबना कहिये या नियति की माया, न जाने कौन सी परीक्षा उस नियति नियंता ने इन मासूम बच्चों के भाग्यलेख में अंकित कर रखी थी कि पिछले शनिवार को उस परिवार के एकमात्र पालनकर्ता पिता मजदूरी करते समय शीत का प्रकोप ना सह सके,,,भयंकर शीतलहर में मात्र एक शर्ट पहनकर मजदूरी कर रहे उस गरीब को ईश्वर ने अपनी शरण में ले लिया,,,पहले ही विपत्ति की मार झेल रहे इस परिवार के लिए यह घटना बहुत ही हृदयविदारक थी, साथी मजदूर भागे दौड़े यह खबर गांववालों को देने निकल पड़े, चूँकि हमारा विद्यालय मार्ग में ही पड़ता था अतः यह सूचना सर्वप्रथम विद्यालय स्टाफ को प्राप्त हुई,,,,सूचना प्राप्त होते ही हम सभी शिक्षक सन्निपात की स्थिति में आ गए,,,हे ईश्वर ! यह कैसा न्याय है? कैसी भाग्यलेखा है? पहले माँ और अब पिता का साया उठ चला, वृद्ध दादाजी जिनकी आय का कोई स्रोत नहीं वे कैसे इन चार मासूम बच्चों का भविष्य सँवार सकेंगे? बच्चों के भविष्य और उनके बचपन पर कठोर प्रहार देखकर एक बारगी तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही मन प्रश्नचिन्ह लगा बैठा किन्तु अंततः सत्य को स्वीकार कर तीनों बच्चों को उनके घर भेज दिया गया,,,आर्थिक अभावों से ग्रस्त इस परिवार में एकमात्र संरक्षक बचे बुजुर्ग ने पैसों के अभाव में उस बदनसीब हुतात्मा की तेरहवीं तक नहीं की तथा गांववालों के कहने पर 'त्रिरात्री' करके सन्तोष कर लिया,,,चौथे दिन उन भाई-बहनों में सबसे बड़ा भाई जो विगत वर्ष उसी विद्यालय से कक्षा पाँच उत्तीर्ण कर चुका था वह मुझसे मिलने विद्यालय आया और मुझसे कहा कि उसके भाई-बहनों को उनके फूफाजी,जिनके खुद चार बच्चे हैं, अपने साथ ले जाने की बात कह रहे हैं, दबे मन से उसने यह भी बताया कि वहाँ का माहौल एकदम अच्छा नहीं है और उनकी हालत और भी दयनीय हो जायेगी, किन्तु दादाजी की आर्थिक आय का कोई स्रोत ना होने के कारण उन सभी भाई-बहनों को जाना होगा जिसमें सबसे बड़े भाई को कोई छोटा मोटा काम करके कुछ धनोपार्जन करने की बात हो रही थी,,,उस 13 साल के अबोध मासूम बच्चे के मुख से ऐसी दुरावस्था सुनकर बहुत दुख हुआ किन्तु यह सोचकर एक कर्तव्यबोध भी जागृत हुआ कि इस बच्चे ने इस संकट की घड़ी में एक ऐसे अध्यापक का स्मरण किया जिससे उसने विगत वर्ष शिक्षा प्राप्त की थी,,,मैंने विद्यालय के समस्त स्टाफ से बात की और अन्य लोगों से भी मदद की गुहार लगायी ताकि माता-पिता के ममत्व से विहीन इन बच्चों को तनिक आलम्ब प्रदान किया जा सके,,,यह अटल सत्य है कि ईश्वर एक मार्ग अवरुद्ध करता है तो कहीं ना कहीं अन्य आशाओं के मार्ग के प्रशस्त भी अवश्य करता है, दैवीय अनुकम्पा से हमारी मदद की गुहार सुनकर कुछ हाथ आगे बढ़े और उस परिवार को ना केवल आर्थिक मदद मुहैया कराई गई अपितु एक समर्पित और समाजसेवी बहन के सौजन्य से उस परिवार के सबसे युवा सदस्य उस 13 वर्षीय बालक को प्रतिमाह 2000/- की आर्थिक सहयोग राशि अग्रिम पाँच वर्षों तक निरन्तर उपलब्ध कराने का निमित्त भी बन गया,,, मुझे यह भली-भाँति पता है कि किसी परिवार के ममत्व और वात्सल्य का मोल हम आर्थिक सहयोग से पूरा नहीं कर सकते किन्तु मन में यह कदाचित सन्तोष अवश्य है कि नन्हीं सी उम्र में एक बड़ी जिम्मेदारी उठाने जा रहे इस तेरह वर्षीय बालक को हम तनिक अवलम्ब प्रदान कर सके,,,साथ ही हृदय में एक गर्व की अनुभूति भी होती है कि संकट और सन्निपात की इस स्थिति में एक पूर्व छात्र आपको एक मार्गदर्शक के रूप में अपनाते हुए मदद की गुहार लगाने आपके पास आता है,,,गर्व, गौरव, दुःख और विषाद के इन मिले जुले क्षणों में आज हमारा पूरा विद्यालय परिवार अपने छात्रों के कठिन समय में उनके साथ खड़ा है यह मेरे लिए सबसे बड़ा नैतिक सम्बल है, साथ ही आभारी हूँ मैं महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अपने गुरुवर श्री सत्य प्रकाश पाण्डेय जी का जिनके सान्निध्य में मैं यह पुनीत कार्य सम्पन्न करवा सका,,,
ईश्वर से प्रार्थना है कि मातृत्व/संरक्षक विहीन उन चार मासूम बच्चों को अपनी छत्रछाया प्रदान करे।
जीवन में कभी-कभी नियति ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है कि यह समझ नहीं आता कि परम पिता परमेश्वर आखिर इतनी कड़ी परीक्षाएँ क्यों लेता है,,,,मेरे विद्यालय में एक ही परिवार के तीन भाई-बहन नामांकित हैं, इस परिवार में कुल चार भाई-बहनों में सबसे बड़े भाई अभी पिछले वर्ष कक्षा पाँच इसी विद्यालय से उत्तीर्ण हुए थे जिनकी उम्र इस समय लगभग 13/14 वर्ष की होगी,,,इनकी माताजी का देहावसान दो वर्ष पहले हो चुका था और परिवार में वृद्ध हो चले दादाजी एवम पिता के अतिरिक्त कोई अन्य सदस्य संरक्षक के तौर पर नहीं था,,,पिता मजदूर वर्ग से थे जो नित्यप्रति की दैनिक मजदूरी से इस छः सदस्यीय परिवार का पेट भरते थे और बुजुर्ग दादाजी बेचारे अपने इन निरीह अबोध बच्चों के भाग्य पर आँसू बहाते किसी तरह दिन काट रहे थे,,,भाग्य की विडंबना कहिये या नियति की माया, न जाने कौन सी परीक्षा उस नियति नियंता ने इन मासूम बच्चों के भाग्यलेख में अंकित कर रखी थी कि पिछले शनिवार को उस परिवार के एकमात्र पालनकर्ता पिता मजदूरी करते समय शीत का प्रकोप ना सह सके,,,भयंकर शीतलहर में मात्र एक शर्ट पहनकर मजदूरी कर रहे उस गरीब को ईश्वर ने अपनी शरण में ले लिया,,,पहले ही विपत्ति की मार झेल रहे इस परिवार के लिए यह घटना बहुत ही हृदयविदारक थी, साथी मजदूर भागे दौड़े यह खबर गांववालों को देने निकल पड़े, चूँकि हमारा विद्यालय मार्ग में ही पड़ता था अतः यह सूचना सर्वप्रथम विद्यालय स्टाफ को प्राप्त हुई,,,,सूचना प्राप्त होते ही हम सभी शिक्षक सन्निपात की स्थिति में आ गए,,,हे ईश्वर ! यह कैसा न्याय है? कैसी भाग्यलेखा है? पहले माँ और अब पिता का साया उठ चला, वृद्ध दादाजी जिनकी आय का कोई स्रोत नहीं वे कैसे इन चार मासूम बच्चों का भविष्य सँवार सकेंगे? बच्चों के भविष्य और उनके बचपन पर कठोर प्रहार देखकर एक बारगी तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही मन प्रश्नचिन्ह लगा बैठा किन्तु अंततः सत्य को स्वीकार कर तीनों बच्चों को उनके घर भेज दिया गया,,,आर्थिक अभावों से ग्रस्त इस परिवार में एकमात्र संरक्षक बचे बुजुर्ग ने पैसों के अभाव में उस बदनसीब हुतात्मा की तेरहवीं तक नहीं की तथा गांववालों के कहने पर 'त्रिरात्री' करके सन्तोष कर लिया,,,चौथे दिन उन भाई-बहनों में सबसे बड़ा भाई जो विगत वर्ष उसी विद्यालय से कक्षा पाँच उत्तीर्ण कर चुका था वह मुझसे मिलने विद्यालय आया और मुझसे कहा कि उसके भाई-बहनों को उनके फूफाजी,जिनके खुद चार बच्चे हैं, अपने साथ ले जाने की बात कह रहे हैं, दबे मन से उसने यह भी बताया कि वहाँ का माहौल एकदम अच्छा नहीं है और उनकी हालत और भी दयनीय हो जायेगी, किन्तु दादाजी की आर्थिक आय का कोई स्रोत ना होने के कारण उन सभी भाई-बहनों को जाना होगा जिसमें सबसे बड़े भाई को कोई छोटा मोटा काम करके कुछ धनोपार्जन करने की बात हो रही थी,,,उस 13 साल के अबोध मासूम बच्चे के मुख से ऐसी दुरावस्था सुनकर बहुत दुख हुआ किन्तु यह सोचकर एक कर्तव्यबोध भी जागृत हुआ कि इस बच्चे ने इस संकट की घड़ी में एक ऐसे अध्यापक का स्मरण किया जिससे उसने विगत वर्ष शिक्षा प्राप्त की थी,,,मैंने विद्यालय के समस्त स्टाफ से बात की और अन्य लोगों से भी मदद की गुहार लगायी ताकि माता-पिता के ममत्व से विहीन इन बच्चों को तनिक आलम्ब प्रदान किया जा सके,,,यह अटल सत्य है कि ईश्वर एक मार्ग अवरुद्ध करता है तो कहीं ना कहीं अन्य आशाओं के मार्ग के प्रशस्त भी अवश्य करता है, दैवीय अनुकम्पा से हमारी मदद की गुहार सुनकर कुछ हाथ आगे बढ़े और उस परिवार को ना केवल आर्थिक मदद मुहैया कराई गई अपितु एक समर्पित और समाजसेवी बहन के सौजन्य से उस परिवार के सबसे युवा सदस्य उस 13 वर्षीय बालक को प्रतिमाह 2000/- की आर्थिक सहयोग राशि अग्रिम पाँच वर्षों तक निरन्तर उपलब्ध कराने का निमित्त भी बन गया,,, मुझे यह भली-भाँति पता है कि किसी परिवार के ममत्व और वात्सल्य का मोल हम आर्थिक सहयोग से पूरा नहीं कर सकते किन्तु मन में यह कदाचित सन्तोष अवश्य है कि नन्हीं सी उम्र में एक बड़ी जिम्मेदारी उठाने जा रहे इस तेरह वर्षीय बालक को हम तनिक अवलम्ब प्रदान कर सके,,,साथ ही हृदय में एक गर्व की अनुभूति भी होती है कि संकट और सन्निपात की इस स्थिति में एक पूर्व छात्र आपको एक मार्गदर्शक के रूप में अपनाते हुए मदद की गुहार लगाने आपके पास आता है,,,गर्व, गौरव, दुःख और विषाद के इन मिले जुले क्षणों में आज हमारा पूरा विद्यालय परिवार अपने छात्रों के कठिन समय में उनके साथ खड़ा है यह मेरे लिए सबसे बड़ा नैतिक सम्बल है, साथ ही आभारी हूँ मैं महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित अपने गुरुवर श्री सत्य प्रकाश पाण्डेय जी का जिनके सान्निध्य में मैं यह पुनीत कार्य सम्पन्न करवा सका,,,
ईश्वर से प्रार्थना है कि मातृत्व/संरक्षक विहीन उन चार मासूम बच्चों को अपनी छत्रछाया प्रदान करे।
साभारः मानवता के रक्षक हम सब के लिए गर्व और गौरव के प्रतीक बेसिक शिक्षा के अनमोल रत्न शिक्षक भाई संतोष प्रजापति प्रा० वि० मोहम्मदपुर काँध, धर्मापुर, जौनपुर।
मित्रो आप भी यदि बेसिक शिक्षा विभाग के सम्मानित शिक्षक हैं या शिक्षा को मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण और अपना कर्तव्य मानते है तो इस मिशन संवाद के माध्यम से शिक्षा एवं शिक्षक के हित और सम्मान की रक्षा के लिए हाथ से हाथ मिला कर अभियान को सफल बनाने के लिए इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में सहयोगी बनें और शिक्षक धर्म का पालन करें। हमें विश्वास है कि अगर आप लोग हाथ से हाथ मिलाकर संगठित रूप से आगे बढ़े तो निश्चित ही बेसिक शिक्षा से नकारात्मकता की अंधेरी रात का अन्त होकर रोशनी की नयी किरण के साथ नया सबेरा अवश्य आयेगा। इसलिए--
आओ हम सब हाथ मिलायें।
बेसिक शिक्षा का मान बढ़ायें।।
बेसिक शिक्षा का मान बढ़ायें।।
नोटः- यदि आप या आपके आसपास कोई बेसिक शिक्षा का शिक्षक अच्छे कार्य कर शिक्षा एवं शिक्षक को सम्मानित स्थान दिलाने में सहयोग कर रहा है तो बिना किसी संकोच के अपने विद्यालय की उपलब्धियों और गतिविधियों को हम तक पहुँचाने में सहयोग करें। आपकी ये उपलब्धियाँ और गतिविधियाँ हजारों शिक्षकों के लिए नयी ऊर्जा और प्रेरणा का काम करेंगी। इसलिए बेसिक शिक्षा को सम्मानित स्थान दिलाने के लिए हम सब मिशन शिक्षण संवाद के माध्यम से जुड़कर एक दूसरे से सीखें और सिखायें। बेसिक शिक्षा की नकारात्मकता को दूर भगायें।
उपलब्धियों का विवरण और फोटो भेजने का WhatsApp no- 9458278429 है।
साभार: शिक्षण संवाद एवं गतिविधियाँ
विमल कुमार
कानपुर देहात
22/12/2016
विमल कुमार
कानपुर देहात
22/12/2016
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