शिक्षक दिवस

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ।
अमिअ मूरी मय चूरन चारू, समन सकल भव रज परिवारू।।

गुरु के महत्व को जानते हुए गोस्वामी जी  रामचरित मानस  के पूवार्द्ध में सर्वप्रथम गुरु की वन्दना करते हुए कहते हैं कि मैं सबसे पहले गुरु के चरण रज की वन्दना करता हूँ, जो सुन्दर स्वाद, सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल का सुन्दर चूर्ण है जो भव रोगों को नाश करने वाला है।
अर्थात गुरु ही इस चराचर जगत में श्रेष्ठ है। गुरु प्रकृति का एक सुन्दर उपहार है। वह अपने गुरुत्व से अपने शिष्य को एक सुदृढ़ व मजबूत  आकार व आधार  देता है जो कि बच्चे व राष्ट्र के  भविष्य  को  उज्ज्वल  एवं समृद्ध बनाता है।
जिस प्रकार से भोजन शरीर को बल देता है और शरीर पुष्ट  होता है। उसी प्रकार शिक्षा से मनस् को बल मिलता है, हमारा मानसिक विकास होता है। वास्तविक शिक्षा-दीक्षा से मनुष्य को ज्ञान, विज्ञान, कौशल एवं शाश्वत और समय के साथ परिवर्तनशील मूल्यों का सही ज्ञान  होता है। सोचने, समझने और आत्मविश्वास को जगाने के लिए शिक्षा संजीवनी का कार्य करती है।

शिक्षा गुरु के बिना सम्भव नहीं है। शिक्षक अर्थात् गुरु के व्यक्तिगत जीवन के बिना कोई शिक्षा नहीं हो सकती है। शिष्य को बाल्यावस्था से ही ऐसे गुरू का सानिध्य मिलना चाहिए जिसका चरित्र जाज्वल्यमान अग्नि के समान हो, जिससे उच्चतम शिक्षा का सजीव आदर्श शिष्य के सामने रहे।
गुरु, ज्ञान, समृद्धि और प्रकाश का अनुपम स्रोत होता है।वह अपने शिष्य को उचित - अनुचित, धर्म- अधर्म, मान- अपमान के बीच के भेद को स्पष्ट रुप से समझाता है। वह अपने शिष्य को ज्ञान, कौशल और सकारात्मक व्यवहार से सज्जित करते हैं। अतः एक शिक्षक की परमसत्ता को कभी नकारा नहीं जा सकता है।
 परमपिता परमेश्वर ने भी सर्वशक्तिमान होकर गुरु के गुरुत्व को स्वीकार किया है। गुरु का प्रादुर्भाव सृष्टि उत्पत्ति के साथ ही हुआ है। गुरु का न तो कोई विकल्प है और न ही कोई पर्यायवाची।
गुरु की जो संकल्पना अनादि काल में की गयी थी, वह दिव्य व अलौकिक थी, अर्थात गुरु की शक्ति  व ज्ञान अलौकिक है, अतुलनीय है, असीमित है। 

आज के परिप्रेक्ष्य में भी गुरु का आशय तो वही है लेकिन गुरु का स्वरूप बदल चुका है, चरित्र बदल गया है, दिशा बदल गयी है, दशा बदल गयी है। नियति बदल गयी है। गरिमा घट गयी है। गुरु शब्द मात्र नौकरी पेशा बनकर रह गया है। जो आदर्श स्वरूप गुरु का परिलक्षित होता था। वह सब कुछ धीरे-2 ओझल होता जा रहा है। अतः आवश्यकता है सबसे पहले गुरू की गरिमा को बनाये रखने की, गुरु शब्द को नौकरी पेशा से न जोड़ने की  व समर्पण भाव से कार्य करने की ताकि गुरु का गुरुत्व बना रहे।

गुरु के कार्यों व चरित्र से समाज को एक उचित दिशा व दशा मिले। आओ इसी उद्देश्य को समझें व संकल्प लें कि शिक्षक दिवस हर रोज मनाएँ। 
शिक्षा का उत्थान करें
 शिक्षक का सम्मान करें।
जन -जन का कल्याण करें।
अन्त में सर्वपल्ली डॉ 0राधाकृष्णन जी को शत् - 2 नमन करते हुए शिक्षक समाज की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पित। आप सभी को  शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
  
लेखक
माधव सिंह नेगी,
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय जैली,
विकास खण्ड-जखौली,
जनपद-रुद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।

 

Comments

  1. समसामयिक और प्रेरक।

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