मत हो निराश

मत हो निराश, मत हो हताश,
रजनी के तम के आगे होता प्रकाश।
सघन बंध सी काराएँ,
कितनी सारी हैं सीमाएँ।
भय विभ्रम की बदली,
कुछ परिवर्तन का मंदहास।
भावी के पथ स्वर्णिम हों,
तुम दीप बनो भरने प्रकाश।
मत हो निराश मत हो हताश।
थकते पग में शूल चुभे हों
अवरोधक भी बहुत बने हों।
मंजिल की दिशा दशा के,
मन में चित्रित चित्र घने हों।
कल के सुन्दर पल के पंथी,
भावों का कर नूतन प्रवास।
मत हो निराश मत हो हताश।
तुम स्वयं प्रखर जीवंत बनो,
संवेदन भर उर सतवंत बनो।
बाधाओं के इस महासमर में
सक्षम हो देने प्रतिउत्तर में।
सृजन सुखद करने का व्रत,
मरुथल में भर दो नयी आस।
मत हो निराश मत हो उदास।

रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला, 
जनपद -सीतापुर।

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