शिक्षक हूँ मैं
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर-घर दीप जलाता हूँ,
गाँव-गाँव हर गली-गली, शिक्षा की अलख जगाता हूँ।
कच्ची मिट्टी की मूर्ति को, नव आकर में गढ़ता हूँ।
मूर्त रूप देने को, सतरंगी रंगों से रंगता हूँ।
जीवन के अनुभवों से मैं, नित नई सीख बतलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर-घर दीप जलाता हूँ.....
पाठ पढ़ाता हूँ मैं इनको, कविता-गीत सुनाता हूँ।
जोड़-घटाना, गुणा-भाग, अभ्यास रोज़ करवाता हूँ।
गद्य-पद्य, रस-छंद, अलंकार का भी भेद बताता हूँ।
सिद्ध प्रमाणिकता करने को, नव प्रयोग दिखलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर -घर दीप जलाता हूँ.....
छुआ-छूत और भेद-भाव, आडम्बर युक्त बताता हूँ।
धर्म-जाति से ऊपर उठकर, मानवता पाठ पढ़ाता हूँ।
नफ़रत, लालच, बैर-भाव से दूर रहो बतलाता हूँ।
सत्य-अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, नैतिकता सिखलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर-घर दीप जलाता हूँ.....
तिनके-तिनके चुन-चुनकर, प्रतिवर्ष नव नीड़ मैं बुनता हूँ।
प्रकाशरूपी ज्ञान से मैं, अज्ञान तिमिर का हरता हूँ।
जिज्ञासा के बिखरे मोती को माला में पिरोता हूँ।
बालकरूपी पौधे को माली बन, ज्ञान से सींचता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर -घर दीप जलाता हूँ.....
खुली आँख से देखे ख्वाबों को, पूरा करवाता हूँ।
स्वतन्त्र विचारों से भरकर, स्वच्छंद विचरण करवाता हूँ।
बना देश के अच्छे नागरिक, राष्ट्र को सुदृढ़ बनाता हूँ।
निर्मित राष्ट्र को करके मैं, फिर राष्ट्रशिल्प कहलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर -घर दीप जलाता हूँ.....
रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।
गाँव-गाँव हर गली-गली, शिक्षा की अलख जगाता हूँ।
कच्ची मिट्टी की मूर्ति को, नव आकर में गढ़ता हूँ।
मूर्त रूप देने को, सतरंगी रंगों से रंगता हूँ।
जीवन के अनुभवों से मैं, नित नई सीख बतलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर-घर दीप जलाता हूँ.....
पाठ पढ़ाता हूँ मैं इनको, कविता-गीत सुनाता हूँ।
जोड़-घटाना, गुणा-भाग, अभ्यास रोज़ करवाता हूँ।
गद्य-पद्य, रस-छंद, अलंकार का भी भेद बताता हूँ।
सिद्ध प्रमाणिकता करने को, नव प्रयोग दिखलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर -घर दीप जलाता हूँ.....
छुआ-छूत और भेद-भाव, आडम्बर युक्त बताता हूँ।
धर्म-जाति से ऊपर उठकर, मानवता पाठ पढ़ाता हूँ।
नफ़रत, लालच, बैर-भाव से दूर रहो बतलाता हूँ।
सत्य-अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, नैतिकता सिखलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर-घर दीप जलाता हूँ.....
तिनके-तिनके चुन-चुनकर, प्रतिवर्ष नव नीड़ मैं बुनता हूँ।
प्रकाशरूपी ज्ञान से मैं, अज्ञान तिमिर का हरता हूँ।
जिज्ञासा के बिखरे मोती को माला में पिरोता हूँ।
बालकरूपी पौधे को माली बन, ज्ञान से सींचता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर -घर दीप जलाता हूँ.....
खुली आँख से देखे ख्वाबों को, पूरा करवाता हूँ।
स्वतन्त्र विचारों से भरकर, स्वच्छंद विचरण करवाता हूँ।
बना देश के अच्छे नागरिक, राष्ट्र को सुदृढ़ बनाता हूँ।
निर्मित राष्ट्र को करके मैं, फिर राष्ट्रशिल्प कहलाता हूँ।
शिक्षक हूँ मैं शिक्षा का, हर घर -घर दीप जलाता हूँ.....
रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।

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