रावण यूँ ही नहीं जलाया करते

हर दशहरे पर हम रावण यूँ ही नहीं जलाया करते।
पूरे वर्ष की बुराईयों की हम इसी दिन  सफ़ाया करते।।
मन पवित्र करते हैं अपना, तन को यूँ सजाया करते ।
कहीं  प्रवेश न कर जाए विपत्ति, सुरक्षा कवच पहनाया करते।।
फिर भी कुछ नेता अपनी जहरीली श्वांस को प्रवेश कराते ।
निज स्वार्थी नाक-कान अपना बचाव कर न पाते।।
नयनों की तो बात निराली, जिव्हा तो है मतवाली।
संयम से कहाँ रह पातीं, देखते ही चेहरे पर छा जाती लाली।।
इन्हीं दुर्गुणों को करने दूर, श्रीराम पृथ्वी पर हैं आते।
भारतवासियों को दे संकेत यहाँ, बहिर्गमन कर जाते।।
इसीलिए दशहरे पर हम रावण यूँ ही नहीं जलाया करते।
पूरे वर्ष की बुराईयों को हम इसी दिन सफ़ाया करते।।
जय श्री राम, जय हनुमान
             
रचयिता
नरेन्द्र सैंगर,
सह समन्वयक,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

Comments

  1. आपकी प्रत्येक रचना संदेशप्रद होती है, बहुत खूब।
    जय श्री राम,जय श्री हनुमान

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