युगपुरुष महात्मा गांधी
सत्य, अंहिसा का था पुजारी, शान्ति दूत बन कर आया,
अंग्रेजी चंगुल से छुड़ाने, गांधी आँधी बन छाया।
पोरबन्दर गुजरात में, 2 अक्टूबर को अवतार लिया,
शिष्टता-सदाचार अपनाकर, नैतिकता का पाठ दिया।
स्नातक की शिक्षा लेकर, लन्दन में कानून पढ़ा,
दक्षिण अफ्रीका में नस्ली, भेद -भाव से पाला पड़ा।
बैरिस्टर उपाधि धारण कर, भारत फिर वापस आया,
पर वकील का पेशा उनको, बिल्कुल भी न रास आया।
देख दुर्दशा भारतीयों की, अंतरात्मा जिसकी जागी,
तन, मन, धन अर्पण कर, जनकल्याण की मन में लगन लागी।
कृषकों की स्थिति सुधार हेतु, अंग्रेजों का विरोध किया,
खेड़ा और चम्पारण में, आंदोलन एक आरम्भ किया।
खिलाफत आंदोलन द्वारा, मुस्लिम समुदाय का उद्धार किया,
भेद-भाव, छुआछूत मिटाकर, भाई-चारे का संदेश दिया।
असहयोग, स्वराज्य और नमक सत्याग्रह शुरू किया,
इरविन समझौता करके हरिजन आंदोलन आरम्भ किया।
स्वदेशी निर्मित वस्तु प्रयोग का जनमानस को मन्त्र दिया,
भारत छोड़ो अंग्रेजों, नई क्रांति का सूत्रपात किया।
भारत को सत्ता दिलाने को, नारा करो या मरो का दिया,
बिना खड़ग और ढाल बिना ही, भारत को स्वतंत्रता दिलवाई।
धन्य हुई भारत की भूमि, आजादी जिसने फिर पाई,
युगपुरूष रूप में महात्मा ने, भारत को ख़ुशहाली दिलवाई।
साबरमती सन्त कहलाये, राष्ट्रपिता का रूप लिया।
नमन तुम्हें हे कर्णधार, जिसने नवभारत सृजन किया।।
रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।
अंग्रेजी चंगुल से छुड़ाने, गांधी आँधी बन छाया।
पोरबन्दर गुजरात में, 2 अक्टूबर को अवतार लिया,
शिष्टता-सदाचार अपनाकर, नैतिकता का पाठ दिया।
स्नातक की शिक्षा लेकर, लन्दन में कानून पढ़ा,
दक्षिण अफ्रीका में नस्ली, भेद -भाव से पाला पड़ा।
बैरिस्टर उपाधि धारण कर, भारत फिर वापस आया,
पर वकील का पेशा उनको, बिल्कुल भी न रास आया।
देख दुर्दशा भारतीयों की, अंतरात्मा जिसकी जागी,
तन, मन, धन अर्पण कर, जनकल्याण की मन में लगन लागी।
कृषकों की स्थिति सुधार हेतु, अंग्रेजों का विरोध किया,
खेड़ा और चम्पारण में, आंदोलन एक आरम्भ किया।
खिलाफत आंदोलन द्वारा, मुस्लिम समुदाय का उद्धार किया,
भेद-भाव, छुआछूत मिटाकर, भाई-चारे का संदेश दिया।
असहयोग, स्वराज्य और नमक सत्याग्रह शुरू किया,
इरविन समझौता करके हरिजन आंदोलन आरम्भ किया।
स्वदेशी निर्मित वस्तु प्रयोग का जनमानस को मन्त्र दिया,
भारत छोड़ो अंग्रेजों, नई क्रांति का सूत्रपात किया।
भारत को सत्ता दिलाने को, नारा करो या मरो का दिया,
बिना खड़ग और ढाल बिना ही, भारत को स्वतंत्रता दिलवाई।
धन्य हुई भारत की भूमि, आजादी जिसने फिर पाई,
युगपुरूष रूप में महात्मा ने, भारत को ख़ुशहाली दिलवाई।
साबरमती सन्त कहलाये, राष्ट्रपिता का रूप लिया।
नमन तुम्हें हे कर्णधार, जिसने नवभारत सृजन किया।।
रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।

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