मजबूरी नहीं मजबूती का नाम महात्मा गांधी
बुद्धजीवियों से पटे इस देश में आज
चर्चाएँ और बहस हो रही है कि मरते वक्त गांधी जी ने हे राम कहा या हाय राम कहा। एक ऐसे पड़ाव पर देश मे गांधी को गाली देने का चलन प्रखर होता जा रहा है जिस वक्त गांधी के आदर्शों एवं संदेशों पर चलना नितांत आवश्यक हो। वाह मेरे डिजिटल आवरण से सने युवाओं आपने अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के दिन गांधी के
हत्यारे पर फूल चढ़ाना शुरू कर
दिया। आपके जोश और खून ने इतना उबाल मार दिया कि हर वक्त देश के लिए सोचने वाले वाले महात्मा को आपने देशद्रोही सिद्ध
कर दिया।
महात्मा शब्द हमने अतिश्योक्ति में नहीं प्रयोग किया ये युवा जोश से भरे सुभाष चंद्र बोस ने सर्वप्रथम प्रयोग किया था। सुभाष चन्द्र बोस और गांधी जी में मतभेद जरूर रहे होंगे पर मनभेद नहीं क्योंकि एक-एक चाहता था कि आजादी इस रास्ते से आये दूसरा चाहता था कि इस रास्ते से पर उद्देश्य दोनों लोगों का आजादी ही थी।
भारत मे कोई ऐसा नेता नहीं हुआ
जिसने जो कहा हो वो किया हो, या जो किया हो वो कहा हो, जो लिखा हो वो किया हो या जो किया हो वो लिखा हो, पर महात्मा गांधी ने अपने अच्छे बुरे सारे कर्मों को
अपनी आत्मकथा में वर्णित किया है।
बहुत से बुद्धिजीवी जो भले खुद संयमित ना हो गांधी जी की तस्वीरें शेयर करते हुए
लिखते हैं कि गांधी जी सदा दो लड़कियों के कंधे पर हाथ रखकर चलते थे और उनके साथ भोग विलास का जीवन जीते थे।
गांधी जी अपनी किताब में लिखते हैं
कि जिस वक्त उनके पिता अंतिम साँसें गिन रहे थे उस समय मैं रतिक्रिया
में मग्न था और बाहर आया तब पिता जी
इस संसार से जा चुके थे। उसी दिन से
गांधी जी ने ब्रह्मचर्य जीवन जीने
का संकल्प ले लिया और ब्रह्मचर्य के रास्ते पर चल पड़े। उनके बीच पति-पत्नी का रिश्ता एक भाई-बहन जैसा हो गया। अब ये कदम एक सामान्य मनुष्य के स्तर से बाहर का है इसे कोई बिरला ही कर सकता है
जिसमें दृढ़ संकल्पी गांधी जी एक
थे।
मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, अल्बर्ट आइंस्टीन, स्टीव जॉब्स, दलाई लामा सहित विश्व के अनेकों प्रसिद्ध व्यक्तित्व महात्मा गांधी के अनुयायी थे। उनके पद चिन्हों पर
चलकर विश्व में कीर्तिमान स्थापित किये।
यही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने
इनके अवतरण दिवस को अंतर्राष्टीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की
कवायद शुरू की। विश्व पटल पर सत्य अहिंसा प्रेम का पाठ पढ़ाकर भारत का मान बढ़ा चुके बापू के साथ उनके ही देश मे ये व्यवहार बिल्कुल निंदनीय है।
इसका पूरा दोष युवा पीढ़ी को शत-प्रतिशत नहीं दिया जा सकता है। इसमें सही
सन्देश सम्प्रेषण का अभाव और
गंदी सियासत भी एक स्तर तक दोषी है।
गांधी जी द्वारा उन परिस्थितियों में लिए गए निर्णय स्वतंत्रता की चौखट पर बैठकर गलत लग सकते हैं पर नीयत पर शक नहीं किया जाना चाहिए।
गांधी जी महान थे, महान हैं और महान रहेंगे। गांधी एक विचारधारा है जो
हमेशा पथ प्रदर्शक का कार्य करती रहेगी।
लोग गलत कहते हैं मजबूरी का नाम
महात्मा गांधी, मजबूरी नहीं
मजबूती का नाम महात्मा गांधी है।
उम्मीद है हम अपने क्रांतिकारियों में तुलना करके बकवास बहस
से बचकर अपने समय को ज्ञात एवं अज्ञात
शहीदों के सपनो का भारत बनाने में लगाएँगे।
राष्ट्रहित में संकल्प लेकर अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होंगे।
गांधी किसी गोली से नहीं मर सकते गांधी
थे, हैं और हमेशा रहेंगे।

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