मेरी चाह

ये बगिया है मेरी,
मैं माली बन जाऊँ।
इन नन्हें पौधों पर,
मैं फूल खिला पाऊँ।

मैं बनूँ कुम्हार वही,
जो देता आकार सही
ना कमी रहे कोई,
ऐसा पात बना पाऊँ।

इन नन्हें पौधों पर,
मैं फूल खिला पाऊँ।

हो शूल भरी राहें,
चाहे दूर रहे मंज़िल,
मैं अथक प्रयासों से
नई राह बना पाऊँ।

इन नन्हें पौधों पर,
मैं फूल खिला पाऊँ।

हर भोर के संग सोचूँ,
बस स्वपन यही देखूँ,
इन मायूस निगाहों में,
नये ख़्वाब सजा पाऊँ।

हो जाऊँ मैं इनकी,
इन्हें अपना बना पाऊँ।
इन नन्हें पौधों पर
मैं फूल खिला पाऊँ।

रचयिता
अनु चौधरी,
सहायक अध्यापक, 
प्राथमिक विद्यालय शंकरपुर,
विकास खण्ड-फरीदपुर,
जनपद-बरेली।

Comments

Total Pageviews