कर्म से है शान आपकी

कर्म से है शान आपकी,
कर्म से पहचान आपकी,
सौभाग्यशाली है नन्हें-मुन्ने,
जिनको ज्ञान की कृपा आपकी।

परचम चारों ओर है फहरा,
पहन चले हैं जीत का सेहरा,
ठान लिया है मन में जिसने,
कदम बढ़ा वो किसने रोका।

दीप जलाकर अंधेरे में,
तूफानों के पहरे में,
सींच रहे कर्तव्य से अपने,
भ्रष्ट तंत्र के घेरे में।

हर ओर उँगलियाँ लिए खड़े हैं,
देखो छोटे - बड़े खड़े हैं,
पर्वत सी बाधा देने को,
ज्ञानी बन अज्ञान खड़े हैं।

दृढ़ कर कदम बढ़ाने वाले,
कब थमते हैं बढ़ने वाले,
शब्द हुए बेजार सभी हैं,
हृदय बसते हैं करने वाले।

रचयिता
नवीन कुमार,
सहायक अध्यापक,
माडल विद्यालय कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

Comments

  1. ऐसी कविता है जिसको पढ़कर उत्साहवर्धन एवं प्रेरणा मिलेगी।
    अति सुन्दर रचना।

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