शास्त्री जी थे जग से न्यारे

लाल बहादुर की संज्ञा से,
संसार ने उनको जाना था।
उनकी सादगी और निष्ठा,
को भी तो सबने माना था।।

छोटा कद था चाह बड़ी थी,
कष्टों की दीवार खड़ी थी।
मातृभूमि को मुक्त कराने
की बस मन में लगन लगी थी।।

मातृभूमि की खातिर जीना,
मातृभूमि पर मिट जाना था।
उनकी सादगी और निष्ठा,
को भी तो सबने माना था।।

जाने कितने लोग यहाँ पर,
आजादी के परवाने थे।
जन-जन की भावनाओं से,
वे भी कहाँ अनजाने थे।।

शास्त्री कहते सब उनको,
सबने उनको पहचाना था।
उनकी सादगी और निष्ठा,
को भी तो सबने माना था।।

संत हृदय थे पूज्य हमारे,
शास्त्री जी थे जग से न्यारे।
सदा गुणों की पूजा होती,
उनके गुण थे सबसे प्यारे।।

अब धड़कन थे वे भारत की,
कहाँ शख्स वो अनजाना था।
उनकी सादगी और निष्ठा,
को भी तो सबने माना था।।

रचयिता
प्रदीप कुमार चौहान,
प्रधानाध्यापक,
मॉडल प्राइमरी स्कूल कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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