सुखमय पाती
मन को भाती, सुखमय पाती,
हरित हरित है, तरु की पाती।
पुष्प और फल, हमको देते,
बदले में क्या हैं हमसे लेते।
परहित जीव जिनका सारा,
वृक्ष वृक्ष है, अनुपम न्यारा।
विविध रूप के लगे मनोहर,
देखो सब ये, जग के अन्दर।
शुद्ध वायु है, जिनसे होती,
प्राण वायु भी, उनसे मिलती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
आम, नीम और पीपल पाकर,
जामुन, कटहल, बरगद छोंकर।
अर्जुन, शिरष कदम्ब सजीला,
कांचनार का पुष्प हो पीला।
छितवन, महुआ, मौलश्री झरबेरी,
कुसुम, कनेर, उदुम्बर गंभेरी।
बहुत वृक्ष हैं, बहुत प्रजाती।
उपयोग आए, फूल औ पाती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
शोभा सुखकर, मन को भाए,
हरियाली शुचि, सुन्दर भाए।
सघन छाँव में जाकर देखो,
सहचर सुनसान मिलेंगे देखो।
शांति सुख नित भरने वाले,
वन उपवन हैं बहुत निराले।
पवन सुरभि सी बहकर आती,
सर सर सर कर संगीत सुनाती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
ग्रीष्म ऋतु जब तपन जलाए,
सूरज आतप जब भर जाए।
बाहर पथ पर तपन रुलाए,
तन मन जैसे अगन जलाए।
तब लगती देखो छाँव सुहानी,
धीमी-धीमी सी वात सुहानी।
शांति मनः दे, क्लान्ति मिटाती,
वृक्ष तलाएँ हर पाती पाती।
मन को भाती, सुन्दर पाती।
अस्तु सभी हम ,वृक्ष लगाते,
काम बहुत हैं, सबके आते।
अपने मौसम फल वे देते,
डाली-डाली भरकर फलते।
कहीं-कहीं पर फूल सुहाने,
मधुपों के स्वर अनजाने।
जीवन आशा फिर मुस्काती,
प्रकृति मित्र बन दिखलाती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
हरित हरित है, तरु की पाती।
पुष्प और फल, हमको देते,
बदले में क्या हैं हमसे लेते।
परहित जीव जिनका सारा,
वृक्ष वृक्ष है, अनुपम न्यारा।
विविध रूप के लगे मनोहर,
देखो सब ये, जग के अन्दर।
शुद्ध वायु है, जिनसे होती,
प्राण वायु भी, उनसे मिलती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
आम, नीम और पीपल पाकर,
जामुन, कटहल, बरगद छोंकर।
अर्जुन, शिरष कदम्ब सजीला,
कांचनार का पुष्प हो पीला।
छितवन, महुआ, मौलश्री झरबेरी,
कुसुम, कनेर, उदुम्बर गंभेरी।
बहुत वृक्ष हैं, बहुत प्रजाती।
उपयोग आए, फूल औ पाती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
शोभा सुखकर, मन को भाए,
हरियाली शुचि, सुन्दर भाए।
सघन छाँव में जाकर देखो,
सहचर सुनसान मिलेंगे देखो।
शांति सुख नित भरने वाले,
वन उपवन हैं बहुत निराले।
पवन सुरभि सी बहकर आती,
सर सर सर कर संगीत सुनाती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
ग्रीष्म ऋतु जब तपन जलाए,
सूरज आतप जब भर जाए।
बाहर पथ पर तपन रुलाए,
तन मन जैसे अगन जलाए।
तब लगती देखो छाँव सुहानी,
धीमी-धीमी सी वात सुहानी।
शांति मनः दे, क्लान्ति मिटाती,
वृक्ष तलाएँ हर पाती पाती।
मन को भाती, सुन्दर पाती।
अस्तु सभी हम ,वृक्ष लगाते,
काम बहुत हैं, सबके आते।
अपने मौसम फल वे देते,
डाली-डाली भरकर फलते।
कहीं-कहीं पर फूल सुहाने,
मधुपों के स्वर अनजाने।
जीवन आशा फिर मुस्काती,
प्रकृति मित्र बन दिखलाती।
मन को भाती, सुखमय पाती।
रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला,
जनपद -सीतापुर।

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