हँसी रावण की

विजय दशमी का पर्व तो,
हर बरस आ जाए।

मर कर रावण, न मर सका,
और खड़ा - खड़ा मुस्काये।

हँस रहा है तुम पर, मुझ पर,
और मन ही मन ये सोचे।

रावण तो बन गये हजार,
पर राम बना न पाये।

सीता हर ली, रावण ने,
तो राम क्रोध में आये।

और पल - पल सीता हर रही,
तो कौन उसे बचाये।

जतन करो कुछ ऐसे भाई,
जन - जन राम बन जाए।

छल - कपट और दंभ- द्वेष से,
मुक्त भारत हो जाए।

छल - कपट और दंभ- द्वेष से,
मुक्त भारत हो जाए।

रचयिता
डॉ0 ललित कुमार,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय खिजरपुर जोशीया, 
विकास खण्ड-लोधा, 
जनपद-अलीगढ़।

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