बाल विवाह
सितम दर सितम कुछ ऐसा किया।
बारह की उम्र में ही ब्याह दिया।।
जब सब उत्सुक थे दावत पाने को।
तब वो लड़ रही थी अपना बचपन बचाने को।।
जब एक कदम बढ़ा विद्यालय जाने को।
तो दूसरे में बाँध दी पायल घर बसाने को।।
एक हाथ में कलम कुछ ऐसी थमाई।
तुरंत से दूसरे हाथ मे मेहंदी रचाई।।
जब विदा होने की घड़ी घर से आई।
उसने रो-रोकर अपनी व्यथा सुनाई।।
लेकिन सच तो ये है-
उन आँसुओं का असली कारण कोई जान न सका।
वो अभी पढ़ना चाहती है ये समाज मान न सका।।
कुछ इस तरह उसे चूल्हे-चौके में झोंक दिया।
उसके पढ़ने का सपना खूँटी मे ठोंक दिया।।
नौ महीनों में कुछ ऐसी प्रथा चलाई।
एक अबोध सी कन्या इक बालक की माँ बनाई।।
इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ ऐसी अज्ञानता चली।
बारह की उम्र मे ही बच्ची बालिका वधू बनी।।
देख इस अज्ञानता को मुझको कष्ट होता है।
इन्हीं कुप्रथाओं के कारण भारत जगद्गुरु का खिताब खोता है।।
अब आगे बढ़कर हमें ही ये श्राप मिटाना होगा।
इस बाल विवाह को जड़ से हटाना होगा।।
रचयिता
आयुषी अग्रवाल,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय शेखूपुर खास,
विकास खण्ड-कुन्दरकी,
जनपद-मुरादाबाद।
बारह की उम्र में ही ब्याह दिया।।
जब सब उत्सुक थे दावत पाने को।
तब वो लड़ रही थी अपना बचपन बचाने को।।
जब एक कदम बढ़ा विद्यालय जाने को।
तो दूसरे में बाँध दी पायल घर बसाने को।।
एक हाथ में कलम कुछ ऐसी थमाई।
तुरंत से दूसरे हाथ मे मेहंदी रचाई।।
जब विदा होने की घड़ी घर से आई।
उसने रो-रोकर अपनी व्यथा सुनाई।।
लेकिन सच तो ये है-
उन आँसुओं का असली कारण कोई जान न सका।
वो अभी पढ़ना चाहती है ये समाज मान न सका।।
कुछ इस तरह उसे चूल्हे-चौके में झोंक दिया।
उसके पढ़ने का सपना खूँटी मे ठोंक दिया।।
नौ महीनों में कुछ ऐसी प्रथा चलाई।
एक अबोध सी कन्या इक बालक की माँ बनाई।।
इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी कुछ ऐसी अज्ञानता चली।
बारह की उम्र मे ही बच्ची बालिका वधू बनी।।
देख इस अज्ञानता को मुझको कष्ट होता है।
इन्हीं कुप्रथाओं के कारण भारत जगद्गुरु का खिताब खोता है।।
अब आगे बढ़कर हमें ही ये श्राप मिटाना होगा।
इस बाल विवाह को जड़ से हटाना होगा।।
रचयिता
आयुषी अग्रवाल,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय शेखूपुर खास,
विकास खण्ड-कुन्दरकी,
जनपद-मुरादाबाद।

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