मित्र का संदेश आया
मैं अकिंचन निज को था समझता,
मित्र का भावों भरा एक संदेश आया।
खिल उठे शतदल जलज उर में,
नीर भावों भरा है दिव्य सर में।
ग्रीष्म के अनुताप में बहती थी हवाएँ,
अग्नि लपटों से हों घिरी जैसे दिशाएँ।
उस ईश के वरदान का परिणाम ही है,
हिय में उमड़ता मेघ कोई आज आया।
मित्र का भावों भरा संदेश आया।।(1)
चल रहे जीवन में थपेड़े झेलता हूँ,
दुख, पीड़ा, विपद में भी खेलता हूँ।
किन्तु मुझे लगता प्रकृति सहचर हमारी,
बचा लेती मुझे और देती शक्ति सारी।
उन्हीं स्पंदनों ने पहुँचकर जब बताया,
मित्र का भावों भरा एक सदेश आया।।(2)
देखता हूँ, पथिक अनगिन संग चलते,
कभी हैं चित्त में, छवि एक बन उभरते।
स्वार्थ की वृत्ति लहरें, घूमतीं पल पल,
सभी होते संशकित, दिन मास अविरल।
पर, मित्र ने धर्म मैत्री का भी निभाया।
मित्र का भावों भरा एक संदेश आया।।

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