मित्रता

 मन से मन का रिश्ता

 कहलाता मित्रता या दोस्ती।

 अच्छे बुरे वक्त में सदा,

 निभाई जाती है दोस्ती।।


 दोस्ती कभी ना देखती,

 सुनो अमीरी और गरीबी।

 ऊँच-नीच से  है  परे,

 बुराई में भी ढूँढे खूबी।।


 स्मरण करना नहीं छोड़ा,

 कृष्ण के मित्र सुदामा ने।

 दे दिया दो लोकों का सुख,

 मित्र को अपने कान्हा ने।।


 दुष्ट अत्याचारी था दुर्योधन,

 कर्ण को सम्यक् ज्ञान था।

 दोस्ती निभाने की खातिर,

 प्राणों का किया बलिदान था।।


 निषादराज जी सखा को,

 वचन दिया था श्री राम ने

 लौटेंगे वनवास से जब भी, 

 मिलेंगे अवश्य कहा श्रीराम ने।।


 रिश्ते बनते और बिगड़ते,

 दोस्ती रहती सदा बरकरार।

 एक दोस्ती हुई लेखनी से,

 निभाएँगे रिश्ता अब लगातार।।


रचयिता

गीता देवी,

सहायक अध्यापक,

प्राथमिक विद्यालय मल्हौसी,

विकास खण्ड- बिधूना, 

जनपद- औरैया।



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