गेंदा(फूलों का एक समाज)
मैं गेंदा हूँ, मैं एक फूल नहीं,
फूलों का समाज हूँ सुन्दर गुलदस्ता हूँ।
उपलब्ध रहता हूँ हर कहीं
हर किसी की पहुँच में हूँ, सस्ता हूँ।।
एक आसन पर सजे सभी
मेरे फूल अभिन्न अंग हैं।
स्वअनुशासन में खड़े सभी
अपनी-अपनी भूमिका में प्रसन्न हैं।।
हर मौसम में मुस्कुराते,
रंग लेकर त्याग समर्पण का।
शोभा बन गरिमा बढ़ाते
साधन बन पुष्प अर्पण का।।
माला बन एक सूत्र में
आसानी से गूँथा जाता हूँ।
गले लगकर प्रेम भाव से
हरदम शोभा बढ़ाता हूँ।।
सच यह भी है कि अहंकार
में मैं महकता ना सही।
पर गुलाब की पँखुडियों सा
आसानी से बिखरता भी नहीं।।
हर मनुष्य का समाज में
दायित्व तय होना चाहिए।
मुझसे जानो व्यक्ति कैसा हो और
समाज कैसा होना चाहिए।।
रचयिता
रमेश चंद्र जोशी(सत्यम जोशी),
सहायक अध्यापक,
रा0 प्रा0 वि0 बैकोट,
विकास खण्ड - धारचूला,
जनपद - पिथौरागढ़,
उत्तराखण्ड।

बहुत ही सुन्दर 👌👌👌🌻🌻
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति सर जी👌👌👌
ReplyDeletegreat...
ReplyDeleteबेहतरीन 👌💐
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