माँ

   'माँ' सिर्फ एक सम्बोधन नहीं 

   मात्र एक 'शब्द' नहीं 

   स्वयं में एक पूरी सृष्टि, जीवन और शक्ति है। 

   माँ ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अनमोल कृति है। 

  कोख में अपनी हमें धारण करती 

 अपने रक्त से हमें सींच जीवन देती 

 प्रसव की असहनीय वेदना सहकर 

 ये सुन्दर स्वपनिल संसार दिखाती। 

 रात -रात भर जागकर थपकी दे सुलाती 

अपने कष्टों को  छिपाकर सदा मुस्कुराती 

बिन कहे इच्छाओं को हमारी पढ़ लेती 

हमारी ख़ुशियों में ही खुद की खुशियाँ ढूँढ़ लेती। 

डाँटती, मारती, चिल्लाती गुस्सा होती 

पर स्वयं ही थोड़ी देर में प्यार से हमें पुचकारती 

नित नये  किस्से, कहनियाँ सुना सबक हमें सिखाती 

आगामी जीवन के लिये परिपक्व हमें बनाती। 

हो जाएँ कितने भी बड़े, बच्चा ही हमको समझती 

बाहर होते हम जब तक, साँस उसकी अटकी रहती 

चाहें हम  कैसै भी हों सदा शुभ आशीष ही देती 

सच में 'माँ' तो बस 'माँ' ही होती। 

माँ की ममता को मात्र मातृ दिवस  मनाकर 

हमें अपने कर्तव्यबोध को नहीं है बिसराना 

हर दिन हर पल चरणों में उसके शीश झुकाकर 

उसको मान देकर उसका सम्मान बढ़ाना। 

ना छोड़ना माँ को वृद्धाश्रम में जाकर 

इतना संस्कार खुद के भीतर जगाना 

जीवन के अन्तिम क्षणों में उसकी लाठी 

बनना ही है सच्चे अर्थों में मातृ दिवस मनाना॥ 

 

रचयिता

विमला रावत,
सहायक अध्यापक,
राजकीय जूनियर हाईस्कूल नैल गुजराड़ा,
विकास क्षेत्र-यमकेश्वर,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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