माँ
मैं धूप, तू छाँव है माँ
मैं लहर, तू समंदर है माँ
कैसे करूँ परिभाषित
तू निश्चल ममता की मूरत है माँ।।
तू प्रेम, समर्पण, त्याग,
मर्यादा, संवेदनाओं का प्रतीक है माँ
सूरज सी तपिश, दया, वात्सल्य
तू चाँद- तारों सी शीतल है माँ।।
नहीं हो सकता तेरे जैसा कोई
शब्दों में बाँध नहीं सकता कोई
तेरे बिना अधूरी है छाया मेरी
नहीं हो सकता तुझ सा पर्याय कोई।।
मेरे हर शब्दों का निचोड़ है तू माँ
मेरे हर सपनों का आकार है माँ
सारे रिश्ते में पाया स्वारथ
बनी फरिश्ता औलादों की खातिर तू माँ।।
हर दौलत है नगण्य
जब तू मुस्कराती है माँ
समझती हूँ मैं खुशकिस्मत
जब तू दुलारती है माँ।।
अंधेरे को उजालों में बदलती है माँ
हर जख्म को क्षणभर में मिटाती है माँ
जीती है हरदम औलाद की खातिर
जुबां पर बद्दुआ न लाती है माँ।।
सभी कागज पर मदर्स डे मनाते हैं आज
खुशियों की लड़ी कलम से सजाते हैं आज
मेरे दिल में हरपल बसी है मेरी माँ
दुआ करती हूँ सलामत रहे तू मेरी माँ।।
रचयिता
ज्योति अग्निहोत्री,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय शेखनापुर घाट,
विकास खण्ड-गोसाईंगंज,
जनपद-लखनऊ।

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