मेरी माँ

नौ महीने गर्भ में रहकर,  सबसे पहले देखा तुझे मेरी माँ|

विस्मित थी किंतु भाव विह्वल, कितनी खुश थी ये मेरी माँ 

कोख में उसकी कभी, मैंने उसके सताया तो था, 

       और कभी रातों में उसको नींदों से जगाया तो था|

मेरे नव जीवन के आरंभ में भी माँ ने हर पीड़ा सही

    फिर मेरी नन्हीं सी देह देखी, प्राणों से भर गई मेरी माँ|

कितनी ही रातों में मैने नींद से नाता तोड़ा था 

       अपनी नींदे मेरे साथ कुर्बान करती ये मेरी माँ|

मेरे टेढ़े-मेढ़े कदमों को सही राह दिखाती थी, 

      अपने हाथों से उँगली थामे हर डगर पर मेरी माँ 

रूठती-मनाती कभी फिर प्यार से सहलाती थी, 

     दोस्त बन हर राह पर मुझसे थी मिलती ये मेरी माँ|

टेढ़ी मेढ़ी रोटियाँ कब मैंने गोल बना लीं थी

      हर कदम पर साया बनकर साथ रहती थी मेरी माँ 

यौवन की देहरी पे जब माँ का कुरता डाला था, 

      अपनी ही छवि देख कर हैरान होती ये मेरी माँ|

हर राह,  हर मंजिल,  हर फैसला बस माँ से था,

  हर वक्त जब भी मुड़के देखा, तो पास ही थी ये मेरी माँ 

वेदी पे बैठी थी मैं जब एक हाथ ने थामा मुझे, 

         धक्! से दिल में यूँ हुआ क्या दूर हो गई मेरी माँ|

मैं दुखी हूँ, या हूँ आहत, ना जाने उसको कैसे पता,  

               मन को पढ़ लेने की कोई देवी है ये मेरी माँ|

मेरा गम, मेरी खुशी, मेरी सफलता या मेरी हार, 

        हर समय एक शक्ति देती, ऐसी सफल इंसान माँ|

हे प्रभु! गर तू मेरे जीवन की इक अभिलाषा सुने, 

      हर जनम,  हर रूप में बस मुझे "यही मेरी माँ" मिले |


रचयिता

भारती खत्री,

सहायक अध्यापक,

उच्च प्राथमिक विद्यालय फतेहपुर मकरंदपुर,

विकास खण्ड-सिकंदराबाद,

जनपद-बुलंदशहर।



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