मातृ दिवस

जन्मदात्री, पालनकर्ता,

हर बच्चे की होती प्राथमिक कक्षा,

हर पल, करती बच्चों की रक्षा।


सही बात माने,

हमें वो जाने,

हमारे सुख दुःख का,

अन्तर पहचाने।


जब छोटे थे, हम रोते थे,

डाक्टर भी बन जाती थी,

दादी माँ के नुस्खे से,

हमें स्वस्थ कर जाती थी।


पढ़ने के लिए हमें डाँटा,

ना सुनी मिला जोर का चाँटा,

आना कानी करने पर,

खरी खोटी भी सुनाती थी।


नर्स की तरह करती थी देखभाल,

बताती बच्चों चलना सँभल सँभाल।


हमने जब कुछ तोड़ा फोड़ा,

माँ ने आकर कान मरोड़ा,

तरकीब लगाते कैसे जाए जोड़ा,

काम सिखाती थोड़ा-थोड़ा।


हमें हमेशा सजाकर रखती,

मुसीबतों से बचाकर रखती,

कोई करता जब हमारी बुराई,

उससे कभी ना बात करती।


घर लगता था बिन उसके खाली,

ना अच्छी लगती थी खाने की थाली।

माँ जब सबका खाना बनाती,

एक दो रोटी ज्यादा थी खाई जाती।


हमें जीवन जीना सिखाया, 

ऐसा प्यार फिर कोई ना दे पाया।


गृहमंत्री थीं और थीं घर की माया,

ईश्वर जैसी थी उनकी छाया।


उनसे हर दिन होता था पूरा,

अब लगता है सब कुछ अधुरा।


मातृदिवस याद तुम्हारी आई,

बिछड़ने की क्यों ईश्वर ने लीला  बनाई,

बच्चे भगवान को क्या जानें,

माँ को ही वो अपना ईश्वर मानें।


रचयिता

डॉ0 प्रीति चौधरी,

सहायक अध्यापक,

उच्च प्राथमिक विद्यालय सुनपेड़ा,

विकास खण्ड-सिकंदराबाद,

जनपद-बुलंदशहर।



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