दीपक

घनघोर है निशा,

निविड़ अंधकार है।

चहुँओर दीखता,

बस तम का प्रसार है।।

निशाचरों से आच्छादित,

धरती आकाश है।।


प्रभात के पुजारी, छुपे हुए कहीं।

भोर का उजारा होगा भी या नही।।


संशय के घटाटोप सब ओर छा रहे।

लगता है ज्यों तम की आरती गा रहे।।


कुछ हैं, कभी भी जो हारे नही हैं।

बेशक आसमां के वो तारे नही हैं।।


खुद को जलाकर रोशन रहे सदा।

कभी जुगनू बन चमके, कभी बन गए दिया।।


इतिहास रोशनी का, उन्होंने ही है लिखा।

जिन्होंने खुद के भीतर एक दीपक जला लिया।।


रचयिता

राजेन्द्र बधानी'राज'

सहायक अध्यापक,

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय छोटीमणि,

विकास खण्ड-चिन्यालीसौड़,

जनपद-उत्तरकाशी,

उत्तराखण्ड।



Comments

  1. शानदार रचना बधानी जी.....
    इस निराशा के माहौल में भी आशा जगाने वाली कविता है....

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