माँ के भाव

माँ के भावों को समझना आसान नहीं होता,

माँ के भाव समझने के लिये माँ होना पड़ता है।


बचपन में ये बात समझ नहीं आती है,

माँ में सारे जग की बुराइयाँ नज़र आती हैं।

लगता है दिन रात मुझे ही टोकती रहती है,

और प्यार ज़रा भी नहीं मुझसे करती है।


अब एक माँ होकर ही माँ की भावना को समझी हूँ,

बचपन की डाँट में छुपी अच्छाइयों को समझी हूँ।

जब दवाएँ सारी बेअसर हो जाती हैं,

तो माँ की दुआएँ ही हैं जो असर लाती हैं।


दूर रहकर भी अपने बच्चों की हिफाज़त करती है ऐसे,

जैसे अनदेखी कोई शक्ति भंवर में किनारा देती है।

माँ के भावों का कोई मोल नहीं होता,

इसके जैसा दुनिया में कुछ अनमोल नहीं होता।


रचयिता

अंजली गुप्ता,

प्रधानाध्यापक,

प्राथमिक विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम) चिल्ली, 

विकास क्षेत्र- बडोखर खुर्द,

जनपद-बाँदा।



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