माँ

जीवन के हर क्षण में,

माँ का आँचल साथ रहा।

आशीष न हो जो तेरा माँ,

जीवन में फिर क्या रहा।।


जब से तेरी कोख में आई,

नवजीवन तूने भी पाया।

देखकर बचपन मेरा,

माँ ने फिर बचपन जिया।।


देखकर मेरे आँसू,

तेरा भी था मन डोले।

कितना भी नाराज रहे माँ,

दुआ देना नहीं भूले।।


खाना खा लेना बेटा,

बोलना नहीं भूलती।

कभी-कभी सोचती हूँ माँ,

माँ से पहले तू क्या थी।।


तू भी तो बचपन में,

अपने माँ बाप की लाडली थी।

 नन्हें-नन्हें कदमों से, 

आँगन में दौड़ा करती थी।।


बेफिक्र नवजीवन तेरा,

होगा नवज्योति की आस में।

बसती होगी सबकी जान,

तेरी हर एक साँस में।।


शायद मुझे नहीं पता पर,

छुप छुप के तू रोती होगी।

जिम्मेदारियों के बोझ तले,

याद उन पलों को करती होगी।।


तुम्हें अपना सारा जीवन,

हम सबपे है वार दिया।

ईश्वर का ही रूप लगे,

तूने इतना प्यार दिया।।


तेरी हर परेशानी को,

अब मुझको है बाँटना।

 काश फिर लौट आए,

 मेरी माँ का बचपना।।


माँ शब्द ही है सार्थक,

निरर्थक यह संसार।

माँ तेरा हर त्याग बना,

आज की रचना का आधार।।


रचयिता

ज्योति विश्वकर्मा,

सहायक अध्यापिका,

पूर्व माध्यमिक विद्यालय जारी भाग 1,

विकास क्षेत्र-बड़ोखर खुर्द,

जनपद-बाँदा।



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