माँ
माँ तो है जगत जननी,
माँ का कोई मोल नहीं।
दावे कर लो जग में कितने,
माँ जैसा अनमोल नहीं।
अनगिनत दुःखों को सहकर,
माँ ने यह सृष्टि रचाई है।
असंख्य तकलीफों को झेलकर,
हमको दुनिया में लाई है।
जब बोलना नहीं आता हमको,
माँ बिन बोले समझ जाती है।
हम कहते हैं माँ तुम नहीं समझोगी,
और वो गुम-सुम चुप हो जाती है।
इंसां बड़ा बन जाए कितना चाहे,
जो दौलत शोहरत मिलती है।
नादां होगा जो नहीं समझे,
माँ की बदौलत मिलती है।
जब आते हैं इस जगत में,
सबसे ज्यादा माँ खुश होती है।
ठेस न पहुँचेऐसी हमसे,
जिससे माँ दुखी होती है।
दम भरते हैं सभी प्यार का,
हर रिश्ते में मिलावट है।
ममता तेरी अनमोल पवित्र है,
बाकी सब दिखावट है।
जन्नत है माँ के कदमों में,
हे इंसा यह भूल न जाना।
जब तक जान है इस तन में,
माँ की ममता का कर्ज चुकाना।
संदेश भेज रहे हैं माँ........,
कैसे बताएँ तेरे बिन कैसे जीते हैं?
जल्दी लौट के आना प्यारी माँ,
तुझ बिन घुट-घुट कर रोते हैं।
चाहे तुम कहीं भी होगी,
हर पल मेरे साथ हैं।
परेशानियाँ हम तक नहीं पहुँचती,
तेरी दुआओं का कवच मेरे पास है।
रचयिता
बबली सेंजवाल,
प्रधानाध्यापिका,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गैरसैंण,
विकास खण्ड-गैरसैंण
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

बेहतरीन
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