लगाएँ वृक्ष

चलो लगाएँ विरवा हम एक,

यहाँ हैं कितने विटप अनेक।

पीपल, पाकड़, वट की छाँव,

प्रचुर हो हरियाली अपने गाँव।


प्रदूषण बढ़ता जाता है नित्य,

समझना होगा हमको सत्य।

कटे जंगल मिटे सब हैं बाग,

बरसती सूरज से जैसे आग।


प्रगति के अनगढ़ से आयाम,

प्रकृति का दोहन हुआ तमाम।

बिछाई है चमचम सी कंक्रीट,

मानते हैं जैसे जीवन कम्पलीट।


मिटा है जैसे प्रकृति से प्यार,

खड़े संकट होते आज अपार।

प्रबुद्धों करना तनिक विचार,

लगाएँ वृक्ष, चलो इस बार।।


करें रोपित पौध, निभाएँ दायित्व,

सुरक्षा करने का अलग महत्व।

बनेगा पौधा देने अपनी छाँव,

सजीला सुन्दर सा होगा गाँव।


रचयिता
सतीश चन्द्र "सौमित्र"
प्रभारी अध्यापक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला, 
जनपद -सीतापुर।

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