बंदा सिंह बहादुर बलिदान पर्व
रामदेव के घर में पुच्छल ग्राम में जन्म पाया,
27 अक्टूबर 1670 में इस जहां में आया।
लक्ष्मण देव नाम था प्यारा, विद्या बहुत नहीं पाई,
कुश्ती और शिकार का शौक इच्छा मन में गहराई।
15 वर्ष की आयु में घटी ऐसी घटना,
मन पर गहरा प्रभाव, अंकित कर गई थी घटना।
गर्भवती हल्दी का शिकार डाल गया शोक में,
घर बार सब छोड़ दिया एक ही आक्रोश में।
बैरागी शिष्य बन गए गुरु थे जानकी दास,
शिष्यत्व ग्रहण किया रहे पंचवटी नासिक के आसपास।
एक सिख सेनानायक ने तोड़ा मुगलों का अजेय भ्रम,
खालसा राज की नींव रखी संकल्पित प्रभुसत्ता संपन्न।
सिक्के और मोहरे जारी कीं गोविंद सिंह के नाम से,
उच्च पद दिलाया निम्न वर्ग को अलग मजहब के नाम से।
पंजाब भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापना खालसा राज की,
दक्षिण के नांदेड़ में गोदावरी तट स्थापना आश्रम की।
शरीर के टुकड़े- टुकड़े हो गए बंदा सिंह बहादुर के,
16 जून को बादशाह फर्रूखसियर के आदेश से।
मुसलमान को दिया हर प्रकार का स्वातंत्र्य,
नमाज पढ़ने और खतवा करवाने में स्वतंत्र।
नायकत्व को याद करने को एक स्मारक का शुभारंभ,
30 नवंबर 2011 को हुआ परियोजना आरंभ।
मातृभूमि का वीर सपूत बलिदान हो गया,
सुशासन के क्षेत्र में अमर नाम हो गया।

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