सिसकता बचपन

इनके  भी  दिल की सुनो पुकार,

इन पर कुछ करो दया, उपकार।

क्रूर  पिता ने शराब की खातिर,

बालश्रम की भट्टी में झोंक दिया।

बचपन छीना, मुस्कान भी छीनी,

खौफ भूख, मार का मुफ्त दिया।

सूनी आँखों संग मूक, अविरल,

ये मन ही मन में घुटते  रहते  हैं।

स्वछंद पंछी सा इनको उड़ने दो,

 सपने तो ये भी बुनते हैं।।

        

खेलने, पढ़ने की उम्र में ये मासूम, 

सड़कों पर कूड़ा चुनते -फिरते हैं।

दो  वक्त  की  रोटी  की  खातिर , 

मजदूरी खेतों में दिनभर करते हैं। 

बीड़ी - तम्बाकू के कारखानों में,

तिल -तिल रोज-रोज ये मरते हैं।

होठों पर न मुस्कराहट खिलती,

सूनी  आँखों  में  आँसू तरते  हैं।

नटखटपन न छीनो मासूमों का, 

   सपने तो ये भी बुनते हैं।।

हैं पढ़ने - लिखने से कोसों दूर,

इन होनहारों का है क्या कसूर।

नहीं खिलौने नन्हें-नन्हें हाथों में,

जिम्मेदारी के बोझे से मजबूर।

मत  कैद  करो  इनका बचपन, 

उन्मुक्त  गगन  में  विचरने दो।

कन्धों  पर  इनके  बस्ता टाँगो,

क ख ग घ one two पढ़ने दो।

जीवन को इनके अर्थ  दो  भाई,

  सपने तो ये भी बुनते हैं।


देख  दुर्दशा  बाल  श्रमिकों  की,

संयुक्त राष्ट्र संघ हरकत में आया।

विश्व  बालश्रम निषेध दिवस हो,

हरवर्ष 12 जून का नियम बनाया।

18  वर्ष उम्र  से  छोटे  बच्चों के,

श्रम करने पर प्रतिबन्ध लगाया।

आशा  की  किरणों का  उजाला,

घुटते जीवन में  इनके  आया है।

भयानक  महापाप हैं बाल श्रम,

ये कलंक "भारत" से मिटाना है।

मिशन  प्रेरणा  को  अपनाकर,

बच्चा-बच्चा शिक्षित बनाना है॥

       

रचयिता

नीलम कौर,
सहायक अध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय शाहबाजपुर,
विकास खण्ड-सिकन्दराबाद,
जनपद-बुलंदशहर।



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