मैं हूँ प्यारा- प्यारा पेड़
मैं हूँ प्यारा-प्यारा पेड़, देकर आश्रय और ऑक्सीजन
तुम सबको देता हूँ, खुशहाल, मधुमय प्यारा जीवन
शाखाओं पर मेरी, रंग -बिरंगी गबरीली चिड़िया
तिनके जोड़ बनाती, अपना सुन्दर सा आशियाना।
मेरी शाखाओं पर तुम, डालते रस्सी बाँधकर झूला
पूरी दुपहरिया छाँव में, झूलते मस्त होकर झूला ।
लद जाता जब मैं, मीठे -मीठे रसीले फलों से
तोड़कर खाते फल, तुम सब मिल खुश मन से।
जड़ें मेरी मिट्टी को, मजबूती से जकड़कर
रोकतीं भू -कटाव को, वेग वर्षा का सहकर।
घनी छाया में बैठकर, पथिक करते विश्राम
पलभर में भीषण उमस से, मिलता उनको आराम।
मैं देता तुम सबको, कुछ ना कुछ आजीवन
फिर भी तुम बन स्वार्थी करते मेरा दोहन।
हाथ जोड़ जन -जन से, करता विनती बार -बार
मत काटो हमको, मत करो हम पर अत्याचार।
प्रकृति मित्र गौरा देवी, मैं करता तुमको नमन
चिपककर पेड़ों से, दिया हमको अभयदान।
वन में जीवन, वन से जीवन सबको समझाया
अपने इस सन्देश को जन -जन तक पहुँचाया॥
रचयिता
विमला रावत,
सहायक अध्यापक,
राजकीय जूनियर हाईस्कूल नैल गुजराड़ा,
विकास क्षेत्र-यमकेश्वर,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

Beautiful poem
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