वट सावित्री पूजा

 कहते हैं वट वृक्ष में,

 देवी-देवताओं का वास होता है।

 जेष्ठ मास की अमावस्या को,

 दिन यह खास होता है।


 प्रातः जल्दी उठकर स्नान,

 और व्रत का संकल्प लें।

 जल चढ़ाकर वट वृक्ष को,

 पूजा, ध्यान, परिक्रमा करें।


 अश्वपति की संतान सावित्री,

 पुराणों में है वर्णित कथा।

 वनवासी राजा धूमत्सेन के पुत्र,

 सत्यवान को पति रूप में चुना।


 जैसे प्रसन्न हुए यमराज,

 सावित्री को तीन वरदान दिए।

 बुद्धि विवेक से अपने पति के,

 हरे प्राण वापस लिए।


 आज के ही दिन सावित्री ने,

 पति जीवन का निवेदन किया।

 पति के प्राण वापस करने को,

 यमराज को भी विवश किया।


 पति की लंबी उम्र की स्त्रियाँ,

 करती हैं कामना।

 बरगद वृक्ष पूजनीय होते हैं,

 यही है अवधारणा।


 बाँस का पंखा, धूप, घी, दीप बाती,

 सुहाग सामग्री, कुमकुम, रोली।

 जल कलश भर रख पूजा में,

 सब मनोकामना पूर्ण हो लीं।


 वटवृक्ष को लपेटकर धागा,

 सात बार परिक्रमा करें।

 पुष्प, अक्षत, भीगा चना गुड़,

 हाथ में लेकर कथा सुनें।


 सभी माताओं और बहनों को,

 पूजा की शुभकामना।

 सौभाग्यवती बनी रहें सब नारी,

 यही है मंगल कामना।


रचयिता

बबली सेंजवाल,
प्रधानाध्यापिका,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गैरसैंण,
विकास खण्ड-गैरसैंण 
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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