महासागर से सीखें आओ

 नन्हीं-नन्हीं जल बूँदों से

 देखो विशाल लहराता सा

 अथाह अनंत विस्तृत है कितना

 महासागर इठलाता सा|


 तट पर इसके बैठ निहारुँ 

 जल तरंगों की जल क्रीड़ा

 उठकर गिरना गिरकर उठना

 मन की हर लेती पीड़ा|


 कोटि रहस्य गर्भ में इसके

 गहराई कोई क्या नापे

 जाने क्या-क्या मिला है इसको 

 मन को ना कोई भाँपे|


 पादप शैल शैवाल जीव सब 

 असंख्य यहाँ जीवन पाते

 परिष्कृत होकर इस के गर्भ में

 सीपी भी मोती बन जाते|


 सीख बड़ी महासागर देता

 गौर यदि हम कर पाएँ

 दुख चाहें अनगिनत मिलें पर

 केवल खुशियाँ ही लौटाएँ|


रचयिता

भारती खत्री,

सहायक अध्यापक,

उच्च प्राथमिक विद्यालय फतेहपुर मकरंदपुर,

विकास खण्ड-सिकंदराबाद,

जनपद-बुलंदशहर।



Comments

Total Pageviews