एक-एक वृक्ष से सजेगी
प्यारे-प्यारे फूल खिले हैं
सुंदर बाग बगीचे उपवन
छटा बिखेरी धरा खड़ी है
सजी-धजी हो जैसे दुल्हन
नीला अंबर जल बिखेरता
काले घन लेकर अपने संग
मंद पवन के झोंके लहराता
प्राणवायु होती है सदा संग
वृक्षों को बेकार न काटो
लगाओ सुंदर-सुंदर वन
एक-एक वृक्ष से सजेगी
निकलेगा धरती का अंग
शपथ ली हम सबने मिलकर
घर आँगन चाहे हो उपवन
एक-एक वृक्ष से सजाएँगे
धरती का आँचल और मन
पीपल, नीम, बरगद की जोड़ी
भरपूर प्राणवायु जग को है देती
अपनी साँसों की डोरी से बाँधकर
मानव जीवन को है सुख देती
रचयिता
सुनीता बहुगुणा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय बिजनी बड़ी,
विकास क्षेत्र - यमकेश्वर,
जनपद - पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

Nice poem🎉🙏🎉
ReplyDeleteThanks 😊
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