इनका बचपन सँवारते हैं
हर दिल की धड़कन हैं जो,
हर किसी से प्यार वो करते हैं।
सृष्टि की है जो अनमोल रचना,
वह तो प्यारे से बच्चे हैं।
भेदभाव से जो रहे दूर,
अपना न कोई बेगाना है।
उनकी नजरों में एक सभी
अंदाज बड़ा निराला है।
मात-पिता की आँखों के तारे,
सबकी नजरों के है जो दुलारे।
जो बेगानों की भी प्यारे हैं,
ऐसे ही होते बच्चे सारे हैं।
इतने मासूम से बच्चों पर,
गिद्ध दृष्टि जो रखते हैं।
दें इनके अधिकारों को मान्यता,
इनका बचपन सँवारते हैं।
चलो! "बाल रक्षा दिवस" मनाकर
बाल अधिकार सुरक्षित करते हैं।
बच्चों की सुंदर किलकारी से,
जग का आँगन रोशन करते हैं।
रचयिता
सुनीता बहुगुणा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय बिजनी बड़ी,
विकास क्षेत्र - यमकेश्वर,
जनपद - पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

Nice poem🎉
ReplyDeleteवाह्ह्हह्ह्ह्ह... खूबसूरत उत्कृष्ट सृजन...
ReplyDelete.. आपकी लेखनी को नमन.. 🙏🌹