धरा की पुकार

धरा आज पुकारती हमें यूँ,
दानव बन बैठा तू आज क्यूँ।

तेरी ही समझ में छिपा मेरा संरक्षण,
मैंने ही किया सदा तेरा भरण-पोषण।

फिर क्यूँ करता इतनी नादानी,
अच्छी नहीं तेरी यह मनमानी।

माना तूने कि मुझसे बड़ा न कोई,
तभी तो है आज मनुष्यता रोई।

मैंने सदा ही तुझको अपनाया,
समझ में तेरी तब भी ना आया।

हाल यही रहा तो हस्ती तेरी मिट जाएगी,
तेरी ही करनी, तेरी हर साँस तुझे रुलाएगी।

अब भी सँभल जा, मेरी महत्ता को समझ,
हरी-भरी धरा को मत बना इतना असहज।

संरक्षण की चाहत ही तुझे जीना सिखाएगी,
दृढ़ संकल्प तेरा निश्चय ही भविष्य सँवारेगी।

रचयिता
प्रकाशी सेमवाल,
सहायक अध्यापक,
रा उ प्रा विद्यालय महरगाँव,
विकास खण्ड-थौलधार,
जनपद-टिहरी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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