बेटियाँ
बेटी होने का गर्व भी मैं करती हूँ
क्योंकि मैं बिटिया घर की दुलारी हूँ।।
स्वीकार किया मैंने कि मैं पराई हूँ
क्योंकि मैं बेटा नही बेटी हूँ।।
स्मृतियों के पुष्पगुच्छ की कली सी हूँ
क्योंकि आज भी उस बाग की सुगंध हूँ
बेटी से अब बहू के रूप में छाई हूँ
क्योंकि पिता के हाथों ब्याही हूँ।।
घर का हर फ़र्ज बखूबी निभाती हूँ
क्योंकि परिवार की मैं जिम्मेदारी हूँ।।
सम्मान सेवा भाव लिये चलती हूँ
क्योंकि रिश्तों को महफूज़ रखना चाहती हूँ।
मैं बेटी तो हर घर की ही शान हूँ
क्योंकि ब्याही गयी कुल की पहचान हूँ।
छोड़ चली बचपन का आँगन
द्वार झरोखे माँ का आँचल
यादों को हृदयतल में संजोए रखती हूँ
क्योंकि मैं एक बेटी और माँ का सुन्दर रूप हूँ।
रचयिता
दीपा पाण्डेय,
प्रवक्ता संस्कृत,
राजकीय बालिका इंटर कॉलेज काकड़,
विकास खण्ड-बाराकोट,
जनपद-चम्पावत।
क्योंकि मैं बिटिया घर की दुलारी हूँ।।
स्वीकार किया मैंने कि मैं पराई हूँ
क्योंकि मैं बेटा नही बेटी हूँ।।
स्मृतियों के पुष्पगुच्छ की कली सी हूँ
क्योंकि आज भी उस बाग की सुगंध हूँ
बेटी से अब बहू के रूप में छाई हूँ
क्योंकि पिता के हाथों ब्याही हूँ।।
घर का हर फ़र्ज बखूबी निभाती हूँ
क्योंकि परिवार की मैं जिम्मेदारी हूँ।।
सम्मान सेवा भाव लिये चलती हूँ
क्योंकि रिश्तों को महफूज़ रखना चाहती हूँ।
मैं बेटी तो हर घर की ही शान हूँ
क्योंकि ब्याही गयी कुल की पहचान हूँ।
छोड़ चली बचपन का आँगन
द्वार झरोखे माँ का आँचल
यादों को हृदयतल में संजोए रखती हूँ
क्योंकि मैं एक बेटी और माँ का सुन्दर रूप हूँ।
रचयिता
दीपा पाण्डेय,
प्रवक्ता संस्कृत,
राजकीय बालिका इंटर कॉलेज काकड़,
विकास खण्ड-बाराकोट,
जनपद-चम्पावत।

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