रौनक कहीं गायब है

स्कूल तो खुल गए,
पर रौनक कहीं गायब है।
न प्रार्थना, न कक्षाएँ,
न टनटनाती घंटी
न तो मैम जी मैम जी का शोर।
न कोई मेरे पीछे चलता,
न कोई नई शिकायत करता।
विद्यालय तो वहीं खड़ा है,
पर नन्हीं शरारतें कहीं गायब हैं।

देखते ही हमको,
वो दौड़कर आना।
किसी की बगिया से
रोज नए फूल लाना।
सबसे पहले देने की,
प्यारी सी होड़ कहीं गायब है।

कहीं से कच्चे-पक्के,
फल तोड़ लाना।
खुद न खाकर,
हमें दे जाना।
वो मासूम बड़प्पन,
कहीं गायब है।

खाली कमरे बेजान दीवारें,
जाने क्या निहारें।
दीवारों में जो रंग भरे,
वो नन्हें कलाकार कहीं गायब हैं।

बहुत ज्यादा याद तुम्हारी,
विद्यालय की तुम रौनक सारी।
काश खत्म हो जाए ये महामारी,
लौट आये फिर से खुशहाली।
लौट आएँ वो पुराने दिन,
और मेरी बगिया के सुंदर फूल।
महक जाए फिर से स्कूल।

स्कूल तो खुल गए,
पर रौनक कहीं गायब है।

रचयिता
सुधा गोस्वामी,
सहायक शिक्षिका,
प्रथमिक विद्यालय गौरिया खुर्द,
विकास क्षेत्र-गोसाईंगंज,
जनपद-लखनऊ।

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