नन्हें-मुन्ने फूल

हम फूल हैं उस बगिया के,
जिस बगिया से हम पले बढ़े।
उस माली के सिंचन से हम,
लेकर ज्ञान अपार पढ़े।
तरह -  तरह  के फूल हैं हम,
अलग- अलग सुगंध बरसाते हैं।
कुछ - कुछ जल्दी कुछ धीरे-धीरे,
इस ज्ञान गंगा में    बहते जाते हैं।
हम सबकी मंजिल एक है,
भले चाहे रास्ते अनेक हैं।
पढ़ना  है बढ़ना है,
ज्ञान के पथ पर हमको
लेकिन विचार धारा नेक  है।
लेकर ज्ञान रुपी सिंचन,
हम आगे बढ़ते जाएँगे।
इस अमूल्य धरोहर की रक्षा,
नित जीवन भर करते जाएँगे।
आयेगा एक समय वह,
जब देश की बागडोर हाथों में होगी।
उठाकर कंधों पर बोझ हम,
हर क्षेत्र में भागीदारी होगी।
देश की रक्षा के खातिर हम,
हर पल मर मिट जाएँगे।
उखाड़ फेंकेंगे हम उनको,
जो हाथ हमारी ओर बढ़ाएँगे।
छा जायेंगे बादल बन कर हम,
धरती पर सुगंध बरसाएँगे।
महकाएँगे इस मिट्टी को हम,
खुशियों के दीप जलाएँगे।
खुशियों के दीप जलाएँगे,
खुशियों के दीप जलाएँगे।

रचयिता
रमेश चन्द्र निराला,
प्रभारी प्रधानाध्यापक,
राजकीय आ0 प्राथमिक विद्यालय छिडिया
विकास खण्ड-गैरसैंण
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

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