हर आदमी बेजुबान है

ज़माना आज ग़फलतों की दुकान है।
कितना गहरा नफरतों का निशान है।।

किसी धुन में मगन है शहर सारा।
कि जैसे हर आदमी बेजुबान है।।

क्यूँ न अँधेरों से दोस्ती कर ली जाए।
उजाला तो चंद पलों का मेहमान है।।

तुमसे ही तो घर असल में घर है।
नहीं तो ईंट पत्थरों का मकान है।।

अब तुम्हीं से रोशन है मेरी दुनियां।
तुम्हारे बिना गुलशन भी वीरान है।।

जितना पढ़ूँ उतना सुकून मिलता है।
कि तुम्हारी शख्सियत गीता और कुरान है।।

ढूँढकर ला दो मेरी ग़ुमशुदा मुस्कान।
सुना है शहर में तुम्हारी बहुत पहचान है।।

रचयिता
प्रदीप कुमार चौहान,
प्रधानाध्यापक,
मॉडल प्राइमरी स्कूल कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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