मैं किसान हूँ
मैं धरा का धूल का,
श्रम सीकरों के फूल का।
एक दिनमान हूँ।
लोग कहते हैं, मैं किसान हूँ।
रज कणों से तन का,
हरिताभ आभा से मन का।
नित्य करता श्रंगार हूँ,
तपन तप रहा अंगार हूँ।
जिन्दगी के झंझावातों में,
स्वयं का अरमान हूँ।
श्रम के विविध रंगों से,
श्रम की नित उमंगों से।
भरा मेरा संसार है,
इस माटी से मेरा प्यार है।
उगाता हूँ फसल मैं,
अन्नदाता की पहचान हूँ।
मैं कष्ट सहता हूँ निरन्तर,
स्वप्नों के प्रश्न हैं न उत्तर।
फिर भी स्वप्न बुनता हूँ,
अनवरत कष्ट सहता हूँ।
जिन्दगी की कहानी लिखता,
मौन के स्वर कहता हूँ।
अभावों में गतिमान हूँ।
सहचर यही है मेरी धरा,
देख लो कितनी उर्वरा।
हवा, सूरज, चाँद, तारे,
बरसात, सूखा सभी कुछ।
गुजरते मेरे सामने से हैं।
और मैं सामना करता हूँ।
अपनी कहानी को लिखता हूँ
तपस्वी सा तप रहा,
पहचानिए, मैं किसान हूँ।
श्रम सीकरों के फूल का।
एक दिनमान हूँ।
लोग कहते हैं, मैं किसान हूँ।
रज कणों से तन का,
हरिताभ आभा से मन का।
नित्य करता श्रंगार हूँ,
तपन तप रहा अंगार हूँ।
जिन्दगी के झंझावातों में,
स्वयं का अरमान हूँ।
श्रम के विविध रंगों से,
श्रम की नित उमंगों से।
भरा मेरा संसार है,
इस माटी से मेरा प्यार है।
उगाता हूँ फसल मैं,
अन्नदाता की पहचान हूँ।
मैं कष्ट सहता हूँ निरन्तर,
स्वप्नों के प्रश्न हैं न उत्तर।
फिर भी स्वप्न बुनता हूँ,
अनवरत कष्ट सहता हूँ।
जिन्दगी की कहानी लिखता,
मौन के स्वर कहता हूँ।
अभावों में गतिमान हूँ।
सहचर यही है मेरी धरा,
देख लो कितनी उर्वरा।
हवा, सूरज, चाँद, तारे,
बरसात, सूखा सभी कुछ।
गुजरते मेरे सामने से हैं।
और मैं सामना करता हूँ।
अपनी कहानी को लिखता हूँ
तपस्वी सा तप रहा,
पहचानिए, मैं किसान हूँ।
रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला,
जनपद -सीतापुर।

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