प्रकृति
हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी?
मनुषता कहीं बचीं है किसी में या पशु हो गए सभी?
अपनी-अपनी ही आज, हर किसी को चिंता है,
हालतों पर बैठकर अब, होती खुलेआम निंदा है।
सरकार को क्या करना चाहिए, ये तो सबके पास है,
पर खुद भी कभी कुछ कर लें, ऐसा ना कोई प्रयास है।
इसने ये किया, उसने वो किया, इसने ये न किया, उसने वो न किया।
सभी के पास ऐसे लम्बे-चौड़े ज्ञान के भाषण हैं।
पर्यावरण का नाश मारकर, करते योग के आसन हैं।
प्रकृति किसी सरकार की नही, ये मेरी और तुम्हारी है।
इसलिए इसे संतुलित रखना, हम सबकी जिम्मेदारी है।
पैसे से कोई कभी साँसें खरीद न पाएगा।
अब भी चेता तो ठीक, वरना मानव बहुत पछताएगा।।
रचयिता
ज्योति चौधरी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय इस्लामनगर
विकास खण्ड-मुरादाबाद,
जनपद-मुरादाबाद।
मनुषता कहीं बचीं है किसी में या पशु हो गए सभी?
अपनी-अपनी ही आज, हर किसी को चिंता है,
हालतों पर बैठकर अब, होती खुलेआम निंदा है।
सरकार को क्या करना चाहिए, ये तो सबके पास है,
पर खुद भी कभी कुछ कर लें, ऐसा ना कोई प्रयास है।
इसने ये किया, उसने वो किया, इसने ये न किया, उसने वो न किया।
सभी के पास ऐसे लम्बे-चौड़े ज्ञान के भाषण हैं।
पर्यावरण का नाश मारकर, करते योग के आसन हैं।
प्रकृति किसी सरकार की नही, ये मेरी और तुम्हारी है।
इसलिए इसे संतुलित रखना, हम सबकी जिम्मेदारी है।
पैसे से कोई कभी साँसें खरीद न पाएगा।
अब भी चेता तो ठीक, वरना मानव बहुत पछताएगा।।
रचयिता
ज्योति चौधरी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय इस्लामनगर
विकास खण्ड-मुरादाबाद,
जनपद-मुरादाबाद।

Comments
Post a Comment