छठ पर्व

जग का तम हरने वाले हे सूर्य तुम्हें प्रणाम
मन का तम भी दूर करो हे सूर्य तुम्हें प्रणाम।

आधि-व्याधि, रोग -शोक को हरने वाले
जीवन अमृत सी किरण रज बरसाने वाले।

जीवन मे उषा, प्रकृति, जल, वायु ,सूर्य की महिमा
छठ पूजा समर्पित इन सबके संग तुम्हें छठ मैया।

कार्तिक शुक्ल की षष्ठी के पावन दिन बार को
स्त्री, पुरुष, बूढ़े और जवान पूजे छठ मैया को।

सब जन करते छठ पूजा मे कठोर अनुष्ठान
उपवास, निर्जला से पहले होता पवित्र स्नान।

प्रसाद, सूर्यअर्ध्य का इसमें बडा़ विधि विधान
छत्तीस घण्टे उपवास ले जल मे रहता इन्सान।

छठ पर्व पहला दिन नहाए - खाए कहलाए
कद्दू की सब्जी, मूँग-चना दाल, चावल पकाए ।

छठ पर्व दूसरा दिन खरना- लोहडा़ कहलाए
शाम को चावल गुड़ गन्ने रस की खीर पकाए।

छठ पर्व तीसरा दिवस संध्या- अर्ध कहलाए
इसमे विशेष प्रसाद ठेकुआ कचबनिया पकाए।

बाँस टोकरी 'दउरा' में प्रसाद फल-फूल सजाए
एक सूप में नारियल फल पुरुष छठ घाट ले जाए।

छठ घाट जाते- जाते छठ गीत मधुर हैं गाते
नदी की मिट्टी से छठ माता का चौरा हैं बनाते।

सादगी, पवित्रता और लोक पक्ष का रूप छठ पूजा
मधुर लोकगीतों  मे लोक जीवन बसता छठ पूजा।

 सभी जन भुला के दैनिक जीवन की मुश्किल
 सेवा, भक्ति भाव से करते कर्म समूह में निश्छल।

यूँ ही नहीं बनते हैं कोई व्रत और विधान
वैज्ञानिक मान्यताओं पर खरे उतरे हैं यह ज्ञान।

सूर्य की पराबैंगनी किरणों की होती अधिकता
मानवजन, पशु-पक्षी के जीवन की ये विवशता।

जनमानस के मन से बनते जो व्रत विधि विधान
भाईचारे और प्रेमपूर्वक रह हम सब करते सम्मान।

रचयिता
प्रेमलता सजवाण,
सहायक अध्यापक,
रा.पू.मा.वि.झुटाया,
विकास खण्ड-कालसी,
जनपद-देहरादून,
उत्तराखण्ड।

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