एक बार तुम बदलो

जीने के अंदाज को न बदलो
जीने को एक अरमान में बदलो
अपने दोनों हाथों से
एक नए आयाम में बदलो,

नवचेतन को
इस नव मन को
हर दिन एक नये पल को
समय के हर साँस में बदलो

बदलकर रख दो इस दुनिया को
बदलें जहां तुम्हारे से
उस जीवन के हर मौसम को
अपने एक विश्वास से बदलो,

लेकर हथेलियों पर नवमन को
नया सवेरा, नया दोपहर हो
सीखने के इस नए स्वाद को
कोशिश करके एक बार तुम बदलो

बदल सको तो तुम बदल के देखो
उड़ने को नया आकाश मिलेगा
कुछ करने का जज्बा मिलेगा
हौसलों से उड़कर देखो
एक नया संसार मिलेगा

कभी ना तुम्हें झुकना होगा
उस बेबस तकदीर के आगे
बन सको तो पखेरू बनो तुम
शीश झुकाए संसार मिलेगा

रचयिता
आराधना कुशवाहा,
सहायक अध्यापक, 
प्राथमिक विद्यालय मोहरगंज, 
विकास खण्ड-चहनियां, 
जनपद-चन्दौली।

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