प्रकृति

हवा में  जहर, जैसा घुल रहा है
साँस लेना भी, दूभर हो रहा है

कभी लेते थे साँस खुलकर हम
आज लगता है, दम भी घुट रहा है।

प्रकृति की मार को तो झेलना है
मनुज अपने किये की पा रहा है।

दौड़ भौतिक सुखों की आयी है
खामियाज़ा उसी का मिल रहा है।

बड़ी जद्दोजहद के बाद मानव
सोचकर भी न कुछ कर रहा है।

प्रकृति सुन्दर बने कुछ तो करें?
समय हाथों से अब फिसल रहा है।

यकीं न हो तो इंतज़ार कर लो
बड़ा संजीदा समय आ रहा है।

रचयिता
डॉ0 रंजना वर्मा "रैन",
प्राथमिक विद्यालय बूढ़ाडीह-1,
विकास खण्ड-भटहट, 
जनपद-गोरखपुर।

Comments

Total Pageviews