प्रेम से प्रगति और शान्ति की ओर
🌹प्रेम से प्रगति और शान्ति की ओर🌹
मित्रों हम सब जानते हैं कि इस जगत में प्रेम प्रकृति का एक सर्वश्रेष्ठ ऐसा उपहार है। जो सम्पूर्ण जीव जगत को एक साथ जोड़ने और समाहित करने की शक्ति रखता है। प्रेम ही तो वह अनन्त शक्ति है जो सजीव और निर्जीव के भेद को खत्म कर एक दूसरे को समाहित कर देता है जिससे श्रेष्ठ जन यह कहने को विवश हुए कि "प्रेम पत्थर को भी भगवान बना देता है"। यही कारण है कि प्रेम मात्र दो जीवों तक ही सीमित नहीं है। प्रेम इस सम्पूर्ण जगत की प्रगति और शान्ति का आधार भी है क्योंकि जब हम प्रेम के सागर में डूब जाते हैं, उसमें खो जाते हैं, समाहित होकर स्वयं को विलीन कर लेते हैं। तब हमारी एकाग्रता ध्यान सब कुछ बाह्य जगत की हलचल से दूर होकर मात्र लक्ष्य की ओर गतिशील रहते हुई शान्ति के वृहद आनन्द सागर में समाहित हो जाती है। ऐसी स्थिति में कौन क्या कहता है? सुनायी ही नहीं देता हैं क्योंकि जब तक व्यक्ति प्रेम सागर में डूबता नहीं है तभी तक बाह्य जगत उसको प्रभावित करता रहता है। जब व्यक्ति डूब जाता है तो बाह्य जगत शून्य और अन्दर के आनन्द में समाहित होते हुए परमानंद में विलीन होने लगता है। जो किसी भी व्यक्ति की प्रगति और शान्ति का सबसे बड़ा कारण है। जिसे पाने और खोजने के लिए व्यक्ति न जाने कितने जतन और दौड़ भाग करता है। जबकि वह उसके ही पास ठीक उसी तरह होता है जैसे- "कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि" ज़रूरत है अपने अन्दर झांकने और खोजने की।
इतिहास गवाह है जितने भी बड़े सामाजिक सुधार और मानवीय सभ्यता के परिवर्तन हुए हैं वह कहीं न कहीं त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा की शक्ति से ही हुए हैं। इसलिए परिवर्तन और शान्ति भी प्रेम के वशीभूत हैं। फिर चाहे संजीव से, निर्जीव से, राष्ट्र से, अपने कर्तव्य से, समाज से, एक शिक्षक के रूप में। अपने विद्यालय और बच्चों से अथवा शिक्षा के उत्थान और शिक्षक के सम्मान से, जिसने प्रेम किया, उसने परिवर्तन जरूर किया है क्योंकि त्याग की शक्ति, छोड़ने की शक्ति यदि किसी में है तो वह मात्र प्रेम में ही है। प्रेम में हानि-लाभ, छोटे-बड़े, यश-अपयश, मान-सम्मान की जगह नहीं होती है। बाकी जगह में तो सब कुछ पा लेने की होड़ मची हुई है। इस होड़ में कुछ लोग पा भी लेते हैं लेकिन एक चीज उन्हें जीवन भर नहीं मिलती। वह है शान्ति और आत्म संतोष। जो जीवन भर न तो जीने देता है और न ही सुकून से मरने देता है। एक जीता जागता जीव जीवन भर मात्र मशीन बनकर रह जाता है जिसका उपयोग उत्पादन तक ही सीमित रहता है। उत्पादन की क्षमता खत्म होते ही हमने सब कुछ पा लेने को समर्पित बड़े-बड़े नामों को निरीह बनकर इस दुनिया से जाते हुए देखा है। यही वह लोग हैं जो जीवन की प्रकृति को अपने नियमों से चलाना चाहते है जबकि उन्हें यह नहीं पता कि नियमों से मशीनें चलती हैं, मानव नहीं चलते हैं। मानवता तो प्रकृति की व्यवस्था और प्रेम से चलती हैं जो सदियों से प्रमाणित और सत्य हैं।
हम भारतवासी इस अनुभव के प्रत्यक्ष गवाह भी हैं कि भगवान राम, भगवान बुद्ध एवं महात्मा गांधी जी जैसे जीवन आज हम सभी के लिए आदर्श हैं तो उसका सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है इनके जीवन में त्याग की प्रधानता और प्रेम की पराकाष्ठा थी। जिससे लक्ष्य के प्रति समर्पण स्वयं जाग्रत होता है।
इनमें एक व्यक्ति अयोध्या से अपनी पत्नी और भाई के साथ निकलता है जो राज का त्याग करता है। प्रेम की शक्ति को स्वीकार करता है। वह सुदूर समूद्र पार दूसरे देश की उस समय की विश्व की सर्व शक्तिशाली राज सत्ता को पराजित करके घर वापस आता है। जहाँ भरत जैसे भाई के त्याग और प्रेम से रामराज की कल्पना को साकार कर देता है। क्या किसी नियमावली में वह शक्ति है जो रामराज की कल्पना को साकार कर सके। लेकिन हम दावा के साथ कह सकते हैं कि यदि दो व्यक्तियों के मध्य राम और भरत जैसा एक- दूसरे के लिए त्याग और निश्छल प्रेम होगा तो उन दोनों व्यक्तियों के मध्य रामराज अवश्य स्थापित होगा। यदि ऐसा ही त्याग और प्रेम, परिवार, समाज और देश के बीच होगा तो उन सभी जगह रामराज ही होगा।
दूसरे तथागत भगवान बुद्ध प्रकृति के सहस्यों से इतना प्रेम कर बैठे कि उन्होंने भी राज सत्ता का त्याग कर प्रकृति के कण-कण से साक्षात्कार कर सम्पूर्ण विश्व को शान्ति का मार्गदर्शन दे गये। जो आज 2500 वर्षों के बाद भी शान्ति के लिए प्रासंगिक हैं। यदि उन्होंने कुछ त्यागा नहीं होता, कुछ छोड़ा नहीं होता, प्रकृति प्रेम के महासागर में डूबे नहीं होते तो क्या उन्होंने जो परिवर्तन समाज में स्थापित किए वह आज हम सभी के लिए 2500 वर्षों बाद भी प्रेरक और मार्गदर्शक होते। शायद नहीं, वह भी वैसे ही दुनिया में आते और चले जाते, जैसे लाखों राजकुमार बनकर दुनिया में आये और चले गये।
तीसरे महापुरुष महात्मा गाँधी जिनकी त्याग की प्रधानता और राष्ट्र प्रेम की पराकाष्ठा ने वह कर दिखाया। जिसे देश के पाँच सैकड़ा से अधिक राज शक्तियाँ न कर पायीं। जिन राज शक्तियों के पास न नियम कम थे, न कानून कम थे, न ही अधिकार और हथियार कम थे और न ही अपने लिए जीने और कुछ पाने, कुछ होने की उत्कृष्ट लालसा कम थी। लेकिन फिर भी एक के बाद एक पराधीन होते हुए गुलाम भारत के प्रतीक बन गये। ऐसी क्या कमी थी, ऐसे क्या कारण थे कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास नियम कानून की शक्ति, सत्ता के नाम पर कुछ नहीं था, जिसे दबाया गया, कुचला गया, पीटा गया, तन पर आधी धोती ऊपर बदन ढकने के लिए और आधी ही नीचे बदन के लिए और चलने के लिए मात्र एक लाठी का सहारा। फिर भी अंग्रेजी शासन जैसे सशक्त राजसत्ता को आधी रात के अंधेरे में भारत को छोड़कर भागना पड़ा। दोनों परिस्थितियों के कारण बिल्कुल स्पष्ट है एक के पास खोने और त्यागने वाली प्रेम की सकारात्मक शक्ति थी और अन्य के पास पाने और शासन करने की नकारात्मक शक्ति थी।
इसलिए क्या हम अपने जीवन में हजारों नियम कानून की जकड़न के बीच एक कोना ऐसा नहीं बनाकर रह सकते हैं जहाँ एक दूसरे के साथ त्याग और प्रेम की सकारात्मक शक्ति को स्थान दे सकें। जहाँ हम एक दूसरे के सहयोग के लिए कुछ त्यागने की शक्ति के साथ प्रेम की उस पराकाष्ठा के साथ जुड़ें जहाँ न कोई छोटा हो और न कोई बड़ा हो जो जहाँ जैसे है वह वहाँ एक दूसरे के साथ परिवार बन कर सुख- दुख का साथी और सहभागी बनकर अपने महापुरुषों द्वारा देखे गये राष्ट्रीय विजन को पूरा कर सके।
इसलिए आप सभी से विनम्रता के साथ निवेदन है कि आप अपने जीवन में कुछ पाना ही चाहते हैं अथवा परिवर्तन, प्रगति और शान्ति भी चाहते हैं। इसके कारणों और परिणामों का आत्म चिंतन जरूर करें।।🙏
सादर: विमल कुमार
मिशन शिक्षण संवाद
9458278429
मित्रों हम सब जानते हैं कि इस जगत में प्रेम प्रकृति का एक सर्वश्रेष्ठ ऐसा उपहार है। जो सम्पूर्ण जीव जगत को एक साथ जोड़ने और समाहित करने की शक्ति रखता है। प्रेम ही तो वह अनन्त शक्ति है जो सजीव और निर्जीव के भेद को खत्म कर एक दूसरे को समाहित कर देता है जिससे श्रेष्ठ जन यह कहने को विवश हुए कि "प्रेम पत्थर को भी भगवान बना देता है"। यही कारण है कि प्रेम मात्र दो जीवों तक ही सीमित नहीं है। प्रेम इस सम्पूर्ण जगत की प्रगति और शान्ति का आधार भी है क्योंकि जब हम प्रेम के सागर में डूब जाते हैं, उसमें खो जाते हैं, समाहित होकर स्वयं को विलीन कर लेते हैं। तब हमारी एकाग्रता ध्यान सब कुछ बाह्य जगत की हलचल से दूर होकर मात्र लक्ष्य की ओर गतिशील रहते हुई शान्ति के वृहद आनन्द सागर में समाहित हो जाती है। ऐसी स्थिति में कौन क्या कहता है? सुनायी ही नहीं देता हैं क्योंकि जब तक व्यक्ति प्रेम सागर में डूबता नहीं है तभी तक बाह्य जगत उसको प्रभावित करता रहता है। जब व्यक्ति डूब जाता है तो बाह्य जगत शून्य और अन्दर के आनन्द में समाहित होते हुए परमानंद में विलीन होने लगता है। जो किसी भी व्यक्ति की प्रगति और शान्ति का सबसे बड़ा कारण है। जिसे पाने और खोजने के लिए व्यक्ति न जाने कितने जतन और दौड़ भाग करता है। जबकि वह उसके ही पास ठीक उसी तरह होता है जैसे- "कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि" ज़रूरत है अपने अन्दर झांकने और खोजने की।
इतिहास गवाह है जितने भी बड़े सामाजिक सुधार और मानवीय सभ्यता के परिवर्तन हुए हैं वह कहीं न कहीं त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा की शक्ति से ही हुए हैं। इसलिए परिवर्तन और शान्ति भी प्रेम के वशीभूत हैं। फिर चाहे संजीव से, निर्जीव से, राष्ट्र से, अपने कर्तव्य से, समाज से, एक शिक्षक के रूप में। अपने विद्यालय और बच्चों से अथवा शिक्षा के उत्थान और शिक्षक के सम्मान से, जिसने प्रेम किया, उसने परिवर्तन जरूर किया है क्योंकि त्याग की शक्ति, छोड़ने की शक्ति यदि किसी में है तो वह मात्र प्रेम में ही है। प्रेम में हानि-लाभ, छोटे-बड़े, यश-अपयश, मान-सम्मान की जगह नहीं होती है। बाकी जगह में तो सब कुछ पा लेने की होड़ मची हुई है। इस होड़ में कुछ लोग पा भी लेते हैं लेकिन एक चीज उन्हें जीवन भर नहीं मिलती। वह है शान्ति और आत्म संतोष। जो जीवन भर न तो जीने देता है और न ही सुकून से मरने देता है। एक जीता जागता जीव जीवन भर मात्र मशीन बनकर रह जाता है जिसका उपयोग उत्पादन तक ही सीमित रहता है। उत्पादन की क्षमता खत्म होते ही हमने सब कुछ पा लेने को समर्पित बड़े-बड़े नामों को निरीह बनकर इस दुनिया से जाते हुए देखा है। यही वह लोग हैं जो जीवन की प्रकृति को अपने नियमों से चलाना चाहते है जबकि उन्हें यह नहीं पता कि नियमों से मशीनें चलती हैं, मानव नहीं चलते हैं। मानवता तो प्रकृति की व्यवस्था और प्रेम से चलती हैं जो सदियों से प्रमाणित और सत्य हैं।
हम भारतवासी इस अनुभव के प्रत्यक्ष गवाह भी हैं कि भगवान राम, भगवान बुद्ध एवं महात्मा गांधी जी जैसे जीवन आज हम सभी के लिए आदर्श हैं तो उसका सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है इनके जीवन में त्याग की प्रधानता और प्रेम की पराकाष्ठा थी। जिससे लक्ष्य के प्रति समर्पण स्वयं जाग्रत होता है।
इनमें एक व्यक्ति अयोध्या से अपनी पत्नी और भाई के साथ निकलता है जो राज का त्याग करता है। प्रेम की शक्ति को स्वीकार करता है। वह सुदूर समूद्र पार दूसरे देश की उस समय की विश्व की सर्व शक्तिशाली राज सत्ता को पराजित करके घर वापस आता है। जहाँ भरत जैसे भाई के त्याग और प्रेम से रामराज की कल्पना को साकार कर देता है। क्या किसी नियमावली में वह शक्ति है जो रामराज की कल्पना को साकार कर सके। लेकिन हम दावा के साथ कह सकते हैं कि यदि दो व्यक्तियों के मध्य राम और भरत जैसा एक- दूसरे के लिए त्याग और निश्छल प्रेम होगा तो उन दोनों व्यक्तियों के मध्य रामराज अवश्य स्थापित होगा। यदि ऐसा ही त्याग और प्रेम, परिवार, समाज और देश के बीच होगा तो उन सभी जगह रामराज ही होगा।
दूसरे तथागत भगवान बुद्ध प्रकृति के सहस्यों से इतना प्रेम कर बैठे कि उन्होंने भी राज सत्ता का त्याग कर प्रकृति के कण-कण से साक्षात्कार कर सम्पूर्ण विश्व को शान्ति का मार्गदर्शन दे गये। जो आज 2500 वर्षों के बाद भी शान्ति के लिए प्रासंगिक हैं। यदि उन्होंने कुछ त्यागा नहीं होता, कुछ छोड़ा नहीं होता, प्रकृति प्रेम के महासागर में डूबे नहीं होते तो क्या उन्होंने जो परिवर्तन समाज में स्थापित किए वह आज हम सभी के लिए 2500 वर्षों बाद भी प्रेरक और मार्गदर्शक होते। शायद नहीं, वह भी वैसे ही दुनिया में आते और चले जाते, जैसे लाखों राजकुमार बनकर दुनिया में आये और चले गये।
तीसरे महापुरुष महात्मा गाँधी जिनकी त्याग की प्रधानता और राष्ट्र प्रेम की पराकाष्ठा ने वह कर दिखाया। जिसे देश के पाँच सैकड़ा से अधिक राज शक्तियाँ न कर पायीं। जिन राज शक्तियों के पास न नियम कम थे, न कानून कम थे, न ही अधिकार और हथियार कम थे और न ही अपने लिए जीने और कुछ पाने, कुछ होने की उत्कृष्ट लालसा कम थी। लेकिन फिर भी एक के बाद एक पराधीन होते हुए गुलाम भारत के प्रतीक बन गये। ऐसी क्या कमी थी, ऐसे क्या कारण थे कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास नियम कानून की शक्ति, सत्ता के नाम पर कुछ नहीं था, जिसे दबाया गया, कुचला गया, पीटा गया, तन पर आधी धोती ऊपर बदन ढकने के लिए और आधी ही नीचे बदन के लिए और चलने के लिए मात्र एक लाठी का सहारा। फिर भी अंग्रेजी शासन जैसे सशक्त राजसत्ता को आधी रात के अंधेरे में भारत को छोड़कर भागना पड़ा। दोनों परिस्थितियों के कारण बिल्कुल स्पष्ट है एक के पास खोने और त्यागने वाली प्रेम की सकारात्मक शक्ति थी और अन्य के पास पाने और शासन करने की नकारात्मक शक्ति थी।
इसलिए क्या हम अपने जीवन में हजारों नियम कानून की जकड़न के बीच एक कोना ऐसा नहीं बनाकर रह सकते हैं जहाँ एक दूसरे के साथ त्याग और प्रेम की सकारात्मक शक्ति को स्थान दे सकें। जहाँ हम एक दूसरे के सहयोग के लिए कुछ त्यागने की शक्ति के साथ प्रेम की उस पराकाष्ठा के साथ जुड़ें जहाँ न कोई छोटा हो और न कोई बड़ा हो जो जहाँ जैसे है वह वहाँ एक दूसरे के साथ परिवार बन कर सुख- दुख का साथी और सहभागी बनकर अपने महापुरुषों द्वारा देखे गये राष्ट्रीय विजन को पूरा कर सके।
इसलिए आप सभी से विनम्रता के साथ निवेदन है कि आप अपने जीवन में कुछ पाना ही चाहते हैं अथवा परिवर्तन, प्रगति और शान्ति भी चाहते हैं। इसके कारणों और परिणामों का आत्म चिंतन जरूर करें।।🙏
सादर: विमल कुमार
मिशन शिक्षण संवाद
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