ये घर स्कूल बन जाते

एक शिक्षिका की तरह
मैं बच्चों के लिए कुछ भी ज्यादा नहीं करती..
बस उतना ही करती हूँ....
जितने कि उम्मीद मैं बचपन में अपने शिक्षकों से करती थी....
बस इतना कि जब भी वो बच्चों की ओर देखें....
उनके चेहरों पर हँसी हो....
क्यूँकि गुस्से वाला चेहरा हमें असहज बना देता था  ...
वो लड़की या लड़का कहकर नहीं....
मेरे नाम से मुझे बुलाएँ....
वो मेरी कमियाँ मेरे दोस्तों के सामने नहीं...
मुझे अकेले में बताएँ..
कभी मेरे सर पर हाथ रखें और कहें....
कोशिश करो... सब हो जाएगा...
 खुल कर  हँसने पर
अनुशासन का चाबुक न चले।
नहीं भाता था घंटों एक जैसी मुद्रा में बैठना...
पंख पसारने दिए जाएँ ......
हो सकता है हम अक्षर पढ़ने वाले छोटे बच्चे हों... पर अपमान और सम्मान की भाषा समझ आती थी .....
शिक्षक जब प्रशंसा करते थे तो लगता था सारा आसमान फतेह कर लिया....
और उनके द्वारा copy पर लिखा गया good
किसी celebrity के ऑटोग्राफ से कम नहीं होता था।.....
Gift में मिलने वाली स्टील की एक छोटी सी प्लेट भी gold medal जितनी खुशी देती थी।
बहुत भाता था जब वो हमारे साथ खेलते थे और बचपन में उस वक़्त चार चाँद लग जाते थे
जब वो गतिविधियों से पढ़ाते थे.... कविता को हमारे साथ गाते थे.... और थोड़ा-थोड़ा भूल जाते थे.....
और हम चुपके से मुस्कुराते थे।.....
जब वो थमाते थे हमारे हाथों में रंगों का डिब्बा तो हँसी में इंद्रधनुष बन जाते थे....
और जब छुट्टी होती तो सोचते.... कि क्यूँ ना ये घर स्कूल बन जाते।

रचयिता
मयंका शर्मा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चनेपुर छबिलेपुर,
विकास खण्ड-बेवर,
जनपद-मैनपुरी।

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