झम-झम बरसा पानी
नभ में घोर घटा घुमड़ी है,
अन्तर में कविता उमड़ी है।
दोनों करते हैं मनमानी,
झम-झम बरसा पानी।।
बहुत प्रचण्ड पड़ी थी गरमी,
सूरज करता था बेशर्मी।
खत्म हुई उसकी नादानी,
झम-झम बरसा पानी।।
रोहन! मोहन! तुम भी आओ,
बरसा का आनन्द उठाओ।
आओ! आओ! गुड़िया रानी,
झम-झम बरसा पानी।।
महका है गुलाब अलबेला,
चम्पा और चमेली बेला।
महकी खूब रात की रानी,
झम-झम बरसा पानी।।
छहर-छहर बूँदें गिरतीं हैं,
ठहर-ठहर हमसे कहती हैं।
मन में जगती नई रवानी,
झम-झम बरसा है पानी।।
अन्तर में कविता उमड़ी है।
दोनों करते हैं मनमानी,
झम-झम बरसा पानी।।
बहुत प्रचण्ड पड़ी थी गरमी,
सूरज करता था बेशर्मी।
खत्म हुई उसकी नादानी,
झम-झम बरसा पानी।।
रोहन! मोहन! तुम भी आओ,
बरसा का आनन्द उठाओ।
आओ! आओ! गुड़िया रानी,
झम-झम बरसा पानी।।
महका है गुलाब अलबेला,
चम्पा और चमेली बेला।
महकी खूब रात की रानी,
झम-झम बरसा पानी।।
छहर-छहर बूँदें गिरतीं हैं,
ठहर-ठहर हमसे कहती हैं।
मन में जगती नई रवानी,
झम-झम बरसा है पानी।।
रचयिता
डॉ0 प्रवीणा दीक्षित,
हिन्दी शिक्षिका,
के.जी.बी.वी. नगर क्षेत्र,

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