एक साधु

उठो, जागो, रुको मत लक्ष्य प्राप्ति कर,
प्रेरणास्रोत, मार्गदर्शक बनाने, ऐसी अलख जगाकर।

ऐसी ही विभूति थी जन्मी पवित्र भारत भू पर,
नाम नरेंद्र से स्वामी विवेकानन्द हो गए कालांतर।

सानिध्य परमहंस का पाकर अलख ऐसी जगा दी,
भारत में नवजागरण युवा में सिंह सदृश हुंकार भर दी।

बोले मैदान में पहले कसरत से स्वस्थ शरीर करो,
धर्म आध्यात्म के आदर्श आचरण का फिर पालन करो।

विश्व सम्मेलन में शिकागो की गोद में,
ऐसा करतल स्वर था गुंजायमान हुआ।

भाइयों-बहनों का पहला संबोधन,
पश्चिम भी मन्त्रमुग्ध  सा हुआ।

विदेशी धरा पर भारतीय दर्शन का,
श्रेष्ठता वो सिद्ध ऐसा कर गया।

पराधीन भारत को गौरव क्षण देकर,
जन-जन में आत्मबोध भर दिया।

ओजस्वी वाणी से साधु ने परहित जीना सिखलाया,
मानवता ही सर्वश्रेष्ठ धर्म, सबको यह समझाया।

नमन नमन, शत शत नमन तुम सम देव विभूति को,
अल्प समय में कर गए थे विश्व गुरु तुम भारत को।

रचयिता
गायत्री पांडे,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय संजयनगर 1,
विकास खण्ड-रुद्रपुर,
जनपद-उधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. वाह्ह्ह्ह्ह! बहुत सुंदर रचना गायित्री जी! हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं

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  2. बेहतरीन👌👌👌👌

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  3. बहुत सुदंर कविता

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  4. बहुत सुन्दर लिखा,🙏🙏🙏🙏

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